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यह है अंग्रेजों के जमाने का निकाय राजा तय करता था अध्यक्ष

rajesh sharma

Publish: Nov 07, 2019 11:08 AM | Updated: Nov 07, 2019 12:30 PM

Jhunjhunu

पहली बार 1931 में जब नामित मंडल का गठन हुआ तब, अध्यक्ष का मनोनयन तत्कालीन जयपुर स्टेट के महाराजा ने किया था। उनकी सहायता के लिए सात सदस्यों की एक समिति थी। इस समिति में तहसीलदार, थाने का दरोगा, स्कूल का संस्था प्रधान व नगर के प्रतिष्ठित व्यक्ति होते थे।


पत्रिका एक्सक्लूसिव
राजेश शर्मा

झुंझुनूं. हमारी नगर परिषद का इतिहास काफी रोचक रहा है। यह शहरी निकाय आजादी से पहले अंग्रेजों के जमाने का है। इसका गठन 1931 में हुआ था। उस समय केवल सात सदस्य थे। नगर परिषद का नाम 'नामित मंडलÓ था। पहले अध्यक्ष प्रेमनाथ दूत थे।
नगर परिषद पर पीएचडी करने वाले डॉ कमल चंद अग्रवाल के अनुसार नामित मंडल का पहला कार्यालय दादाबाड़ी क्षेत्र में था। इसके बाद शहीदान चौक स्थित सिंघानिया हवेली से नामित मंडल का संचालन किया गया। वर्ष 1975-76 तक यह कार्यालय नटराज सिनेमा के पास अखेगढ़ में चला। काफी वर्ष तक किराये के भवन में चलने के बाद पालिका का अपना भवन 1975-76 में वर्तमान जगह पर स्थानांतरित हुआ। वर्ष 2007 में यह पालिका क्रमोन्नत होकर नगर परिषद बन गई।


यह बने अध्यक्ष/सभापति
नामित मंडल के पहले अध्यक्ष प्रेमनाथ दूत थे। राजस्थान विधानसभा के पहले अध्यक्ष नरोत्तमलाल जोशी भी पालिकाध्यक्ष रह चुके। इनके अलावा सीताराम शर्मा, केदारमल मोदी, कमलचंद सिंघानिया, महावीर जैन व बनवारी लाल वैद्य अध्यक्ष रहे। 1973 से 1994 तक पालिकाओं के चुनाव नहीं हुए। इस दौरान पालिका मरणासन्न स्थिति में रही। इसके प्रशासक के रूप में कलक्टर व एसडीएम ने कार्य संभाला। 74 वें संविधान संशोधन के बाद 1994 में चुनाव हुए। जिसमें रमेश टीबड़ा पहले अध्यक्ष बने।

1994 के बाद यह रहे पालिकाध्यक्ष
-रमेश टीबड़ा
-हाकिम दाउद अली
-रमेश कुमार टीबड़ा
-तैयब अली
-भारती टीबड़ा
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पहली सभापति भारती
वर्ष 2008 में हमारी नगर पालिका नगर परिषद में क्रमोन्नत हो गई। तब पालिकाध्यक्ष भारती टीबड़ा थी। फिर यही सभापति बन गई। भारती टीबड़ा पालिकाध्यक्ष थी, कार्यकाल के बीच पालिका परिषद में क्रमोन्नत हुई, इस कारण भारती बिना चुनाव ही सभापति बन गई थी। इसके बाद पहली बार सभापति के चुनाव हुए। जिसमें खालिद हुसैन सभापति बने। खालिद हुसैन के बाद सुदेश अहलावत सभापति बने। अब आरक्षण के कारण महिला सभापति बनेगी।
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पहली बार सात थे सदस्य
पहली बार 1931 में जब नामित मंडल का गठन हुआ तब, अध्यक्ष का मनोनयन तत्कालीन जयपुर स्टेट के महाराजा ने किया था। उनकी सहायता के लिए सात सदस्यों की एक समिति थी। इस समिति में तहसीलदार, थाने का दरोगा, स्कूल का संस्था प्रधान व नगर के प्रतिष्ठित व्यक्ति होते थे। इसके बाद 1954 में सदस्यों (पार्षदों) की संख्या बढ़कर 16 हो गई। 1973 में पार्षदों की संख्या बढ़कर 24 कर दी गई। वर्ष 1994 में पार्षद 35 हो गए। वर्ष 2008 में 45 तथा इसी वर्ष इनकी संख्या बढ़कर 60 हो गई।

अटूट रहेगा भारती का रेकॉर्ड
भारती टीबड़ा ऐसी महिला है जिसका रेकॉर्ड टूटना मुश्किल है। क्योंकि यह ऐसी महिला है जो पालिकाध्यक्ष भी रही है और सभापति भी। ऐसे में यह एक मात्र महिला रहेगी। अब महिला सभापति तो बन जाएगी, लेकिन वह पालिकाध्यक्ष रही हुई नहीं होगी। पूर्व पालिकाध्यक्षों में मात्र तैयब अली व भारती ही जीवित हैं। इस बार तैयब अली महिला सीट होने के कारण सभापति नहीं बन पाएंगे। ऐसे में भारती का रेकॉर्ड टूटना लगभग मुश्किल है।


एक्सपर्ट व्यू

भारत के संविधान संशोधन के इतिहास में एक आमूल चूल परिर्वतन 74 वें संविधान संशोधन अधिनियम से किया गया। इसे सामाजिक क्रांति का मेगनाकार्टा कहा जा सकता है। इससे स्थानीय स्वशासन संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ। नगर परिषद का दायित्व व कर्तव्य है कि शहर में सफाई, रोशनी, पानी की निकासी, सड़क, पार्कों का समुचित विकास हो। जनप्रतिनिधि व कार्मिक ईमानदार, पारदर्शी व कार्यकुशल बनें।

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