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न्यायाधीश बोले, एफआइआर के आधार पर भारी राशि स्वीकृत करना झूठी रिपोर्ट दर्ज कराने को बढ़ावा देना है

Jitendra Kumar Yogi

Publish: Jul 20, 2019 12:28 PM | Updated: Jul 20, 2019 12:28 PM

Jhunjhunu

आदेश में लिखा कि अनुसूचित जाति जनजाति अधिनियम तथा पॉक्सो अधिनियम में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवाने के पश्चात लगभग 70 प्रतिशत से अधिक मामलो में परिवादी पक्षद्रोही हो जाता है तथा केवल प्रथम सूचना रिपोर्ट के आधार पर एक भारी राशि अंतरिम तौर पर स्वीकृत करना झूठी रिपोर्ट दर्ज कराने को बढ़ावा देना है।

झुंझुनूं. लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम तथा बालक अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम के विशेष न्यायाधीश सुकेश कुमार जैन ने शुक्रवार को दिए एक आदेश में अनुसूचित जाति की एक पीडि़ता को पीडि़त प्रतिकर के तहत दी गई तीन लाख रुपए की सहायता राशि के समय पूर्व भुगतान की जांच के कलक्टर को आदेश देते हुए दी गई सहायता राशि की वसूली के लिए भी प्रभावी कार्य करने के आदेश दिए हैं। न्यायालय ने यह भी आदेश दिया कि कलक्टर अपनी रिपेार्ट यथा संभव दो माह के भीतर पेश करे।
आदेश में लिखा कि अनुसूचित जाति जनजाति अधिनियम तथा पॉक्सो अधिनियम में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवाने के पश्चात लगभग 70 प्रतिशत से अधिक मामलो में परिवादी पक्षद्रोही हो जाता है तथा केवल प्रथम सूचना रिपोर्ट के आधार पर एक भारी राशि अंतरिम तौर पर स्वीकृत करना झूठी रिपोर्ट दर्ज कराने को बढ़ावा देना है।
न्यायालय ने लिखा कि यह भी देखा गया है कि अपराध घटित होने पर भी सरकार से सहायता राशि लेने के पश्चात लालचवश अभियुक्त से राजीनामा करके राजीनामा योग्य अपराध नहीं होने पर भी धनराशि के बदले परिवादी पक्षद्रोही हो जाता है और न्यायायिक प्रक्रिया एक मजाक के साथ साद्श्य बन जाती है। मामले के अनुसार अनुसूचित जाति के परिवादी सुनील ने एक रिपोर्ट पुलिस थाना बगड़ पर दी कि उसकी लड़की घरवालों के बिना बताए चली गई है। उसे शक है कि उसकी लड़की को विक्की उर्फ धोलिया ले जा सकता है। पुलिस ने मामला दर्ज करने के बाद जब पीडि़ता के मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान करवाए तो पीडि़ता ने कहा कि वह अपनी मौसी के साथ जयपुर चली गई थी, इसलिए उसके पिता ने रिपोर्ट दर्ज करवा दी। विक्की उसका दोस्त है वह उसे कहीं लेकर नहीं गया और ना ही उसके साथ कोई गलत काम किया। अनवेषण के दौरान पीडि़ता व उसके माता-पिता ने पीडि़ता का मेडिकल मुआयना करवाना से मना कर दिया। परंतु परिवादी के बयानों में शक के आधार पर आरोपी विवेक उर्फ विक्की उर्फ धोलिया के विरूद्ध पॉक्सो व अनुसूचित जाति, जनजाति अधिनियम में आरोप पत्र पेश कर दिया। बाद में न्यायालय ने विवेक उर्फ विक्की उर्फ धोलिया निवासी ब्राह्मणों की ढाणी तन खुडाना को 3 जून 2019 को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया।

 

एक जागरूक न्यायाधीश का कर्तव्य है कि कानून की खामियां सुधारे
न्यायालय ने अपने आदेश में लिखा कि जब परिवादी व पीडि़ता द्वारा किसी प्रकार से अपराध घटित होने से मना कर दिया। इसके बावजूद किस आधार पर 29 अगस्त 2018 को एक लाख रुपए व 24 सितम्बर 2018 को दो लाख रुपए की सहायता राशि परिवादी को स्वीकृत की गई, जो एक गंभीर प्रश्र खड़ा करती है। न्यायालय ने लिखा की पीडि़त प्रतिकर के रूप में सरकार की ओर से जो सहायता राशि दी जाती है वह लोकधन से दी जाती है तथा यह लोकधन आमजनता का वह धन है जिसकी सरकार केवल मात्र ट्रस्टी है। न्यायालय ने यह भी लिखा कि एक जागरूक न्यायाधीश का कत्र्तव्य है कि जो तथ्य सरकार के संज्ञान में नहीं है उनसे सरकार को अवगत कराये और कानून में लूपहोल व खामियां है उसे सुधार करने के लिए सुझाव दे। इस मामले में आरोप पत्र न्यायालय में 16 जनवरी 2019 को भेजा गया था परन्तु कलक्टर के पत्र अनुसार आरोप पत्र न्यायालय में भेजे जाने से पूर्व ही 75 प्रतिशत राशि अर्थात तीन लाख रुपए का भुगतान 24 सितम्बर 2018 को किया जा चुका था जो जांच का विषय है तथा यह भी जांच का विषय है कि कहीं इस राहत राशि अदा करने में कहीं भ्रष्टाचार का खेल तो नहीं चल रहा है तथा इस सहायता राशि के बदले परिवादी से इस राशि का एक भाग वसूला तो नहीं जा रहा। अत: जिला कलक्टर को आदेशित किया जाता है कि उक्त राहत राशि का समयपूर्व भुगतान के सम्बन्ध में जांच कर इसकी रिपोर्ट दो माह में पेश करे। सरकार से पीडि़त प्रतिकर की राशि लेना तथा न्यायालय में पक्षद्रोही होना दो नावों की सवारी करने जैसा है जिसकी इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। न्यायालय ने आदेश की एक प्रति सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग/विधि विभाग तथा रालसा को भी भेजने का आदेश दिया।