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पाक से छीना था भारत का यह गांव, खूबसूरती ऐसी कि बस...

Nitin Bhal

Publish: Aug 22, 2019 00:38 AM | Updated: Aug 22, 2019 00:38 AM

Jammu

Jammu Kashmir: लद्दाख क्षेत्र की नुब्रा घाटी में एक तरफ श्योक नदी और दूसरी ओर कराकोरम पर्वत श्रृंखला की ऊंची चोटियों से घिरा तुरतुक गांव अपने में समूचा इतिहास समेटे है। नुब्रा घाटी में...

श्रीनगर. लद्दाख क्षेत्र की नुब्रा घाटी में एक तरफ श्योक नदी और दूसरी ओर कराकोरम पर्वत श्रृंखला की ऊंची चोटियों से घिरा तुरतुक गांव अपने में समूचा इतिहास समेटे है। नुब्रा घाटी में स्थित तुरतुक तक पहुंचना आसान नहीं है। लेह के पहाड़ों-घाटियों से गुजरती ऊबड़-खाबड़ सडक़ ही यहां तक पहुंचने का एकमात्र रास्ता है। हालांकि सडक़ के दोनों तरफ मनोरम दृश्यों की भरमार है। दृश्य ऐसे कि नजरें बस ठहर जाएं।

1947 की जंग के बाद तुरतुक पाकिस्तान के नियंत्रण में चला गया था, लेकिन 1971 की लड़ाई में भारत ने इसे फिर से हासिल कर लिया। सरहद से सटे इस गांव को सुरक्षा कारणों से भारत ने पाकिस्तान को नहीं लौटाया। तब से यहां भारत का नियंत्रण है। यहां के सरहदी इलाके पिछले कई दशकों से शांत हैं और 2010 में तुरतुक को सैलानियों के लिए भी खोल दिया गया है। यहां के सभी गांव वालों के पास भारतीय पहचान-पत्र हैं। 1971 में कब्जे के बाद सभी को भारतीय नागरिकता दे दी गई थी।

पहाड़ों का सीना चीर लाए हरियाली

पाक से छीना था भारत का यह गांव, खूबसूरती ऐसी कि बस...

तुरतुक में पथरीला परिवेश होने से खेती आसान नहीं है। फिर भी यहां के निवासियों ने पहाड़ों का सीना चीर कर हर तरफ हरियाली कर दी है। यहां की मुख्य फसल जौ है। तुरतुक अपनी खुबानी और अखरोट के लिए मशहूर है। हालांकि इनकी खेती मेहनत का काम है। यहां के खेतों में सालों भर काम चलता है। कभी पौधे लगाए जा रहे होते हैं तो कभी उनकी कटाई हो रही होती है। यहां की कम ऊंचाई की वजह से बाल्टी लोग यहां कुट्टू भी बोते हैंै। कराकोरम पर्वत श्रृंखला के भूरे पहाड़ों और नदी घाटियों की वीरान जमीन के बीच तुरतुक की हरियाली नखलिस्तान सरीखी लगती है।

बाल्टी नस्ल के लोग

पाक से छीना था भारत का यह गांव, खूबसूरती ऐसी कि बस...

लद्दाख का बाकी हिस्सा बौद्ध बहुल है, लेकिन तुरतुक एक बाल्टी गांव है। बाल्टी एक नस्लीय समूह है जिनके पूर्वज तिब्बती थे और जो अब मुख्य रूप से पाकिस्तान के स्कर्दू इलाके में रहते हैं। वे बाल्टी भाषा बोलते हैं, जो मूल रूप से एक तिब्बती भाषा है। यहां के गांव वाले नूरबख्शिया मुसलमान हैं, जो इस्लाम की सूफी परंपरा का हिस्सा है। गांव के लोग सलवार कमीज पहनते हैं। इनके अलावा उनकी और भी कई चीज़ें बाल्टिस्तान में रहने वाले अपने कुनबे के लोगों से मिलती-जुलती हैं। नियंत्रण रेखा से आगे पाकिस्तान की ओर जाने पर उनकी बस्तियां हैं।


पत्थर को बनाया जिंदगी का साथी

पाक से छीना था भारत का यह गांव, खूबसूरती ऐसी कि बस...

बाल्टी लोगों ने कराकोरम के पत्थरों को अपना साथी बना लिया है। वे पत्थरों से दीवारें बनाते हैं। उनके घर और चारदीवारी भी पत्थरों से ही बनी हैं। खेतों की सिंचाई के लिए नालियां भी पत्थरों से बनाई गई हैं। तुरतुक की ऊंचाई लद्दाख के दूसरे इलाकों से कम है। यह गांव समुद्र तट से सिर्फ 2,900 मीटर की ऊंचाई पर है। यहां ख़ासी गर्मी पड़ती है। गांव वालों ने पथरीले परिवेश का इस्तेमाल करके प्राकृतिक पत्थर-शीत भंडारण गृहों का निर्माण किया है, जहां वे मांस, मक्खन और गर्मी में खराब होने वाली दूसरी चीज़ें रखते हैं। बाल्टी भाषा में इनको नांगचुंग कहते हैं, जिसका मतलब होता है शीत घर। पत्थरों से बने इन बंकरनुमा घरों में ठंडी हवा आने-जाने के लिए सुराख बने होते हैं। जिससे अंदर रखी वस्तुएं बाहर के तापमान से ठंडी रहती हैं।