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भाभा के बाद संभाला था काम, अंतरिक्ष और परमाणु क्षेत्र में कमाया नाम

Nitin Bhal

Publish: Aug 12, 2019 18:07 PM | Updated: Aug 12, 2019 18:07 PM

Jammu

Vikram Sarabhai: कॉस्मिक रे और अंतरिक्ष पर रिसर्च के लिए पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन करने वाले डॉ. विक्रम साराभाई की12 अगस्त को 100वीं जयंती है। गूगल ने भी डूडल...

जम्मू. कॉस्मिक रे और अंतरिक्ष पर रिसर्च के लिए पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन करने वाले डॉ. विक्रम साराभाई ( Dr. Vikram Sarabhai ) की 12 अगस्त को 100वीं जयंती है। गूगल ने भी डूडल ( google doodle ) बनाते हुए इनको याद किया है। डॉ. साराभाई परमाणु ऊर्जा विभाग के अध्यक्ष रहे थे। अंतरिक्ष की दुनिया में सभी साराभाई ने बहुत योगदान दिया। भारत को अंतरिक्ष की पहुंचाने में इनका बहुत बड़ा हाथ था। होमी जहांगीर भाभा की प्लेन क्रैश में मृत्यु के बाद पूरा देश स्तब्ध था। परमाणु और अंतरिक्ष के क्षेत्र में नए भारत को ऐसे व्यक्ति की तलाश थी जो भाभा के काम को आगे बढ़ा सके। ऐसे वक्त में 1966 में डॉ. साराभाई ने परमाणु ऊर्जा विभाग के अध्यक्ष का पद संभाला था। इससे पहले वे इसरो के भी अध्यक्ष रहे। इन्होंने परमाणु उपकरणों को शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किए जाने के पक्ष में अपने तर्क दिए। डॉ. साराभाई ने गुजरात के कॉलेज से पढ़ाई की। आगे की पढ़ाई के लिए वो कैंब्रिज यूनिवर्सिटी चले गए थे। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इन्होंने बेंगलुरु के भारतीय विज्ञान संस्थान में नोबेल विजेता डॉक्टर सी.वी रमन के साथ काम किया। साराभाई निरस्त्रीकरण और परमाणु उपकरणों के शांतिपूर्ण इस्तेमाल पर होने वाली कई कॉंन्फ्रेंस और अंतरराष्ट्रीय पैनलों के अध्यक्ष रहे। डॉ. साराभाई कैम्ब्रिज फिलोसोफिकल सोसाइटी के सदस्य थे और अमरीकी जियो फिजिकल यूनियन के भी सदस्य थे। 1962 में इन्हें इसरो का कार्यभार सौंपा गया था।

लेते थे सिफ एक रुपए सैलरी

Google payed tribute to Dr. Sarabhai with Doodle

डॉ. साराभाई के पिता के सफल व्यवसायी थे। निजी संपत्ति को देखते हुए उन्होंने अपने काम के लिए मात्र एक रुपए की टोकन सैलरी में काम किया। 1942 में साराभाई का विवाह मृणालिनी साराभाई से हुआ था। इनकी पहली संतान कार्तिकेय का जन्म 1947 में हुआ। डॉ. साराभाई ने अहमदाबाद में एक प्रायोगिक उपग्रह के जरिए संचार माध्यम बनवाने में भूमिका निभाई जो भारतीय गांवों के लिए एक शैक्षिक टेलीविजऩ परियोजना की महत्वपूर्ण कड़ी थी। इसे एक साल बाद अमरीकी उपग्रह के साथ शुरू होना था लेकिन बाद में वो भारत निर्मित और भारत से लॉन्च होने वाले उपग्रह में बदल गया। 30 दिसंबर 1971 में केवल 52 साल की उम्र में ही इनकी मौत हो गई। केरल के एक सरकारी होटल में नींद में ही उन्होंने प्राण त्याग दिया था। वे केरल के थुंबा रॉकेट-लॉंचिंग स्टेशन में होने वाली एक कॉन्फ्रेन्स में हिस्सा लेने के लिए वहां पहुंचे थे। इसके विकास में उनका योगदान था।

कलाम जैसी प्रतिभा को तराशा

Google payed tribute to Dr. Sarabhai with Doodle

डॉ. साराभाई ने पूर्व राष्ट्रपति डॉ.अब्दुल कलाम का न सिर्फ इंटरव्यू लिया, बल्कि उनके करियर के शुरुआती चरण में उनकी प्रतिभा को निखारने में अहम भूमिका निभाई। डॉ.कलाम ने खुद कहा था कि वह तो उस फील्ड में नवागंतुक थे। डॉ.साराभाई ने ही उनमें खूब दिलचस्पी ली और उनकी प्रतिभा को निखारा। डॉ. अब्दुल कलाम को मिसाइल मैन बनाने वाले डॉ. साराभाई ही थे। डॉ. कलाम ने कहा था कि डॉ. साराभाई ने मुझे इसलिए नहीं चुना था क्योंकि मैं काफी योग्य था बल्कि मैं काफी मेहनती था। उन्होंने मुझे आगे बढऩे के लिए पूरी जिम्मेदारी दी। उन्होंने न सिर्फ उस समय मुझे चुना जब मैं योग्यता के मामले में काफी नीचे था, बल्कि आगे बढऩे और सफल होने में भी पूरी मदद की। अगर मैं नाकाम होता तो वह मेरे साथ खड़े होते।