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तराइन के युद्ध का साक्षी तलवाड़ा 

Bhola Nath Shukla

Publish: May 24, 2015 17:26 PM | Updated: May 24, 2015 17:26 PM

Jaipur

सिंधु सभ्यता जैसी प्राचीन सभ्यता का इतिहास समेटे हनुमानगढ़ जिले का गांव तलवाड़ा झील मध्यकालीन भारत के ऐतिहासिक युद्ध की स्मृतियां संजोए हुए है।

सिंधु सभ्यता जैसी प्राचीन सभ्यता का इतिहास समेटे हनुमानगढ़ जिले का गांव तलवाड़ा झील मध्यकालीन भारत के ऐतिहासिक युद्ध की स्मृतियां संजोए हुए है। अजमेर के शासक पृथ्वीराज चौहान व मुहम्मद गौरी के बीच दो बार हुए युद्धों को तराइन की लड़ाई के नाम से जाना जाता है। इतिहास गवाह है कि इन दो युद्धों ने भारत की तस्वीर बदल दी। भारतीय शासकों की आपसी फूट के कारण तराइन की दूसरी लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान की पराजय हुई और इसके साथ ही भारत में तुर्क सम्राज्य की नींव पड़ी। करीब आठ सौ वर्ष पूर्व लड़े गये इन युद्धों के स्थान को लेकर इतिहासकारों में काफी विवाद रहा। लेकिन इस विवाद के बीच में अधिकतर इतिहासकार टिब्बी क्षेत्र के तलवाड़ा झील की भूमि को ही तराइन युद्ध का स्थान स्वीकार करते हैं। 

पहले भागा, फिर जीता
तराइन के दो युद्ध 1191 व 1192 में लड़े गये। 1191 में हुए युद्ध में मोहम्मद गौरी को हार का मुंह देखना पड़ा। लेकिन एक साल बाद 1192 में इसी जगह पर हुए दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज चौहान को पराजय का मुंह देखना पड़ा। गौरी की सेना ने उन्हें बंदी बना लिया। उसके बाद इतिहासकार मतैक्य नहीं है। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि गौरी ने चौहान को कत्ल करवा दिया तो कुछ कहते हैं कि शब्द बेधी बाण चलाने की कला का प्रदर्शन देखते हुए गौरी पृथ्वीराज चौहान के बाण का शिकार हो गया। 

महत्व नहीं मिला
साहित्यकार ओम पुरोहित कागद का कहना है कि भारतीय इतिहास की धारा बदलने वाले दो युद्ध तलवाड़ा झील में लड़े गए। लेकिन इसके बावजूद इस क्षेत्र को ऐतिहासिक दृष्टि से वह महत्व नहीं मिल पाया जो मिलना चाहिए था। कागद ने गांव में पृथ्वीराज चौहान की प्रतिमा लगाने तथा वहां संग्रहालय स्थापित करने की जरूरत बताई है। इससे एक ओर जहां लोगों को क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व का पता चलेगा, वहीं दूसरी ओर पर्यटन की संभावनाएं भी बनेगी। तलवाड़ा झील से पंचायत समिति सदस्य साधना व्यास का कहना है कि ऐतिहासिक युद्धों की साक्षी रही इस जगह को पहचान दिलाने के लिए गांव में संग्रहालय खोल कर उन युद्धों से संबंधित सामग्री रखनी चाहिए। ग्रामीण विनोद कुमार जांदू का कहना है कि इतिहास की किताबों में तराइन की लड़ाइयों का तो उल्लेख है, तलवाड़ा झील का नहीं। सरकार इस गांव का नाम भी इतिहास की पुस्तकों में दर्ज करवा दे तो यहां का ऐतिहासिक महत्व बढ़ेगा।

विशेषज्ञों की राय में
त  राइन के दोनों युद्ध तलवाडा झील की भूमि पर ही लड़े गये। इस सम्बंध में इतिहासकार व वद्र्धमान महावीर ओपन यूनिवर्सिटी कोटा के पूर्व कु लपति प्रो.घनश्याम लाल देवड़ा का कहना है कि वास्तव में तथ्यों के आधार पर देखा जाए तो तलवाड़ा झील में ही तराइन के युद्ध लड़े गये। उन्होंने तलवाड़ा झील के  ही तराइन युद्ध स्थल होने के पक्ष में अनेक तर्क दिये हैं। उनका कहना है  कि भटनेर तथा इसके आसपास का क्षेत्र मध्य एशिया से आने वाले आक्रांताओं का केन्द्र बिन्दू रहा है। मध्य एशिया से आने वाले आक्र ांता इसी मार्ग से पहुंचते थे। देवड़ा के अनुसार प्रसिद्ध इतिहासकार रेवट्री ने तराइन के युद्ध को भटनेर से पूर्व की ओर 14 कोस की दूरी पर तथा भटनेर-दिल्ली के प्रसिद्ध मार्ग पर सिरसा के पश्चिम में होना सिद्ध किया। उन्होंने  जो स्थान बताया  वह तलवाड़ा झील के अलावा और नहीं हो सकता। इतिहासकार हबीबुल्लाह, हबीब व निजामी ने सरसुती अर्थात सिरसा क्षेत्र के आसपास तराइन के युद्ध की बात कही है। एक तथ्य यह भी है कि पूर्व मध्यकाल में युद्ध उन्ही स्थानों पर लड़े जाते थे जहां पानी की पर्याप्त व्यवस्था हो। इतिहासकार मानते है कि उस समय तलवाड़ा झील क्षेत्र में पर्याप्त पानी का भण्डार था। पूर्व मध्यकाल में तलवाड़ा झील को हौजेआब(जलाशय का तट) नाम से सम्बोंधित किया जाता था जो वर्तमान नाम से मेल खाता है।