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बड़े सहकारी बैंकों का अकेला नियामक होगा आरबीआइ!

Jagmohan Sharma

Publish: Dec 09, 2019 00:19 AM | Updated: Dec 09, 2019 00:19 AM

Jaipur

किंग अधिनियम में लाने की तैयारी: सुलझ सकता है दोहरे नियमन का विवादास्पद मुद्दा

मुंबई. बड़े आकार के शहरी सहकारी बैंकों (यूसीबी) को एकल रूप से बैंकिंग नियमन अधिनियम के प्रावधानों के तहत लाया जा सकता है, जबकि छोटे सहकारी बैंक पहले की ही तरह सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार की निगरानी में बने रहेंगे। ऐसा होने पर 53 वर्षों से जारी दोहरे नियमन का विवादास्पद मुद्दा सुलझ सकता है।
बैंकिंग अधिनियम में मार्च 1966 से लागू हुए बदलावों के बाद यूसीबी को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के दायरे में लाया गया था। हालांकि सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार का भी इन बैंकों के बोर्ड एवं प्रबंधन से संबंधित मामलों में नियंत्रण बना रहा। इस तरह शहरी सहकारी बैंकों पर दोहरा नियमन चलता रहा। लेकिन दोहरे नियमन की वजह से बढ़ती मुश्किलों को देखते हुए अब बड़े यूसीबी को सीधे आरबीआई की निगरानी में रखने पर विचार किया जा रहा है।
खत्म होगा दोहरा नियम
संशोधित योजना में छोटे एवं बड़े दोनों तरह के यूसीबी में जमा राशि को भारतीय जमा बीमा निगम से सुरक्षा कवर मिलेगा। बीमित जमा में बढ़ोतरी होने पर उसे भी लाभ मिलेगा। नया प्रारूप के दायरे में देश भर के 1,551 यूसीबी आएंगे। एक आधिकारिक सूत्र ने संभावित बदलावों पर कहा, आरबीआइ और वित्त मंत्रालय के बीच चर्चा काफी आगे बढ़ चुकी है। इस आशय के बदलाव वाले विधेयक को संसद के मौजूदा सत्र में ही पेश किया जा सकता है। इतना साफ है कि दोहरा नियमन खत्म हो जाएगा।
यूसीबी को लेकर संकेत
शहरी सहकारी बैंकों का नोडल प्रभार कृषि मंत्रालय के पास है। इस संबंध में राज्य सरकारों की तरफ से भी सूचनाएं आने की संभावना है। आर गांधी समिति ने 2015 की अपनी रिपोर्ट में कहा था कि 20,000 करोड़ रुपए से अधिक कारोबार वाले सहकारी बैंकों को वाणिज्यिक बैंक बना दिया जाए। इस सुझाव पर फिर से गौर किया जा रहा है।
यहां तक कि इस स्तर से नीचे के सहकारी बैंकों को भी बैंकिंग अधिनियम के दायरे में लाया जा सकता है। मसलन, संकट में फंसे पंजाब एवं महाराष्ट्र सहकारी (पीएमसी) बैंक का कारोबारी आकार 12,000 करोड़ रुपए ही था। आरबीआइ ने अपनी हालिया मौद्रिक नीति समीक्षा में यूसीबी के भविष्य को लेकर कुछ संकेत दिए।

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