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वो पहली बार जेल गया, जब बाहर आया तो बन गया अपराध जगत का डॉन

Pushpendra Singh Shekhawat

Publish: Oct 23, 2019 08:00 AM | Updated: Oct 22, 2019 21:59 PM

Jaipur

'कल्लू', 'कालिया' बनकर आता है बाहर, सजायाफ्ता और विचाराधीन बंदियों को रखने की अलग-अलग व्यवस्था नहीं होने से पनप रहे हैं खूंखार अपराधी

धीरेंद्र भट्टाचार्य / जयपुर। जैसी संगत-वैसी रंगत। प्रदेश के जेलों में सजायाप्ता और विचाराधीन बंदियों को रखने की व्यवस्था पर यह कहावत एकदम सटीक बैठ रही है। प्रदेश की सभी केंद्रीय जेलों में सजायाप्ता और विचाराधीन बंदियों को अलग-अलग रखने की कोई व्यवस्था नहीं है। इसके चलते जेल में सुधरने के बजाय साधारण अपराधी भी खुंखार बदमाशों के चंगुल में आकर गुंडे का तमगा लगा लेते हैं।

जेलों में सजायाप्ता और विचाराधीन बंदियों के लिए अलग जेलों की व्यवस्था नहीं की गई, तो प्रदेश में गुंडों का ग्राफ और तेजी से बढ़ता ही जाएगा। प्रदेश की जेलों में अभी सजायाप्ता कैदियों से करीब तीन गुना ज्यादा विचाराधीन कैदी है। प्रदेश की नौ केंद्रीय और अजमेर की हाई सिक्योरीटी जेल में अभी सजायाप्ता 5054 कैदी हैं, जबकि विचाराधीन बंदियों की संख्या 14921 है।

साधारण मारपीट में जेल गया, बहर आकर बन गया हिस्ट्रीशीटर
सुपर स्टार अमिताभ बच्चन की फिल्म 'कालिया' में भी सजायाप्ता और विचाराधीन बंदी की संगत का असर बताया गया है। इसमें साधारण गांव का कल्लू नाम आदमी झगड़े में जेल में जाता है और बाहर आने के बाद वह नामी गुंडा कालिया बन जाता है। यही आलम प्रदेश की जेलों में भी नजर आ रहा है।

देखिए इसकी बानगी-------
केस नंबर- एक

जेल में जाकर बन गया अंतरराज्यीय तस्कर
जयपुर जिले के नांगल-नटाटा गांव निवासी खेमचंद बुनकर मारपीट के छोटे-मोटे मामले में वर्ष 2009 में जयपुर सेंट्रल जेल में पहली दफा बतौर विचाराधीन बंदी बनकर गया था। जेल में वह करीब दो माह तक सजायाप्ता बंदियों के साथ रहा। इस दौरान उसको अंतरराज्यीय तस्कर पश्चिम बंगाल के कलिया चक निवासी कय्यूम ने जाली नोटों की तस्करी में मालामाल हो जाने का लालच देकर जाल में फांस लिया। जेल से बाहर आने के बाद खेमचंद कय्यूम गिरोह के बदमाशों से संपर्क कर जाली नोटों की तस्करी करने लग गया और देखते ही देखते तस्करों की दुनिया में खेमचंद तस्कर खेमा के नाम से चर्चित हो गया। जाली नोटों की तस्करी के मामले में खेमा अभी जेल में ही है।

केस नंबर- दो
गलतागेट इलाके निवासी रमजानी शेख 2001 में साधारण मारपीट के मामले में जेल गया था। जेल के अंदर हथियार तस्करों की संगत ने उसे पूरी तहर से अपराध के दलदल में दखेल दिया। जेल से बाहर आने के साथ ही हथियारों की तस्करी करने लगा और एक-दो साल में ही इतने अपराध कर डाले, जिसके चलते वह इलाके का हिस्ट्रीशीटर बन गया।

केस नंबर-तीन
आमेर के कुंडा निवासी सन्नी खान भी कहानी भी कुछ इसी तरह से ही है। वर्ष 1999 में वह छोटे-मोटे में मामले में जयपुर सेंट्रल जेल गया। जेल में उसे भी सजायाप्ता कैदियों के साथ रखा गया, जिसके चलते उसके चाल-चलन में सुधार होने की बजाय जेल से बाहर आने बाद वह अपराध जगत की दलदल में फंसता ही गया।

केस नंबर- चार
कोतवाली थाना इलाके के हिस्ट्रीशीटर कन्हैया लाल की कहानी भी कुछ इसी तरह से है। साधारण मारपीट के मामले में कन्हैया एक बार जेल क्या गया, खुंखार अपराधियों की संगत में आकर वह अपराध की राह में सरपट दौड़ता चला गया।

हाईसिक्योरिटी जेल में भी विचाराधीन बंदी
कुख्यात अपराधियों को जेल के विधि-विधान का मूल पाठ पढ़ाने के लिए अजमेर में हाई सिक्योरिटी के नाम से विशेष जेल बनाई गई है। जेल में भी अपराधिक वारदातों को अंजाम देने वाले कैदियों को अन्य कैदियों से दूर रखने के लिए ही इस विशेष जेल को बनाया गया था, लेकिन इस जेल में भी सजायाप्ता कैदियों से ज्यादा विचाराधीनों को रखा जा रहा है। इस जेल में साजायाप्ता कैदी 19 है, जबकि 22 विचाराधीन बंदी है।

विचाराधीन कैंदी सजायाप्ताओं से इम्प्रेस हो जाते हैं

हां, यह सही है कि अंडरट्रायल और विचाराधीन कैदियों के जेलों की अलग-अलग व्यवस्था होनी चाहिए। विशेषकर युवा विचाराधीन बंदी सजायाप्ता बदमाशों के संपर्क में आने से अक्सर उनसे इम्प्रेस हो जाते हैं।
-एनआरके रेड्डी, जेल डीजी, राजस्थान