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प्रदेश में बाल लिंगानुपात बढ़कर हो गया 948

Anil Chauchan

Publish: Sep 22, 2019 18:41 PM | Updated: Sep 22, 2019 18:41 PM

Jaipur

National Daughter Day : Rajasthan top in saving daughter राजस्थान राज्य, बालिका भ्रूण हत्या रोकने और Daughter को Education उपलब्ध कराने की दिशा में किए अपने सफल प्रयासों के लिए लगातार पिछले तीन साल से पूरे Country भर में Beti Bachao Beti Padhao कार्यक्रम के क्रियान्वयन में अव्वल रहा है। ऐसे समय में जब इस रविवार पूरा देश, National Daughter Day मना रहा है।

National Daughter Day : जयपुर . राजस्थान राज्य, बालिका भ्रूण हत्या रोकने और बेटियों ( Daughter ) को शिक्षा ( Education ) उपलब्ध कराने की दिशा में किए अपने सफल प्रयासों के लिए लगातार पिछले तीन साल से पूरे देश ( Country ) भर में बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ ( Beti Bachao Beti Padhao ) कार्यक्रम के क्रियान्वयन में अव्वल रहा है। ऐसे समय में जब इस रविवार पूरा देश, राष्ट्रीय बेटी दिवस ( National Daughter Day ) मना रहा है।


बालिका शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्य कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदेश सरकार को बेटियों पर अभी और निवेश करने की आवश्यकता है। कोख में बेटियों को कत्ल करने वालों पर शिकंजा कसने की मुहिम के तहत राज्य की पीसीपीएनडीटी सेल ने अब तक 154 डिकॉय ऑपरेशन किए हैं, इसका असर ये हुआ कि गर्भावस्था में बच्चे का चयन करने और गर्भ में बेटी होने पर अवैध गर्भपात कराने की प्रवृत्ति में कमी आई है।

राष्ट्रीय बेटी दिवस
- बेटी बचाने में राजस्थान रहा अव्वल
- अब शिक्षा और पोषण पर ध्यान देने की जरूरत
- प्रदेश में बाल लिंगानुपात बढ़कर हो गया 948
- सरकार को बेटियों पर अभी और निवेश की जरूरत

प्रदेश के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के प्रेग्नेंसी एंड चाइल्ड ट्रेकिंग सिस्टम में दर्ज आंकडों के अनुसार इस वर्ष प्रदेश में जन्म के समय बाल लिंगानुपात बढ़कर 948 हो गया है जो कि वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार मात्र 888 था। यानि 2011 से 2019 की तुलना में जीवित शिशु जन्म दर के अनुसार बालिका लिंगानुपात में 60 अंकों का सुधार हुआ है। राजस्थान में बच्चों के लिए काम कर रही संस्था, सुरमन की सचिव और राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की पूर्व अध्यक्ष मनन चतुर्वेदी का कहना है कि कोख में बेटियों को सुरक्षित करने में सफल होने के बाद अब राजस्थान को उन बेटियों की ओर ध्यान देना चाहिए जो जन्म ले चुकी हैं, खासकर जो किशोरावस्था में हैं। अगर हम स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़े अन्य पैमानों की ओर देखें तो स्थिति सुधारने की आवश्यकता है। लड़कियों की शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य, बालिकाओं से जुड़े अपराध व हिंसा समेत सामाजिक और सांस्कृतिक मोर्चों पर अभी हमें बहुत कुछ हासिल करना बाकी है।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे - 2015.16 (एनएफएचएस-4)
- 18 वर्ष आयु से पहले विवाहित 20-24 वर्ष की महिलाएं - 35 से 40 प्रतिशत
- 15 से 19 वर्ष आयु की गर्भवती या मां बन चुकी किशोरियां - 6.30 प्रतिशत
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सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे रिपोर्ट 2016
- 5 वर्ष से कम आयु वाली बच्चियों की मृत्यु दर (प्रति हजार जन्म) 49
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शिक्षा की वार्षिक स्थिति रिपोर्ट (एएसईआर रिपोर्ट 2018)
- 7 से 10 वर्ष आयु की स्कूल में नहीं जाने वाली बच्चियां - 2.60 प्रतिशत
- 11 से 14 वर्ष आयु की स्कूल में नहीं जाने वाली बच्चियां - 7.40 प्रतिशत
- 15 से 16 वर्ष आयु की स्कूल में नहीं जाने वाली बच्चियां - 20.10 प्रतिशत

राष्ट्रीय परिवार एवं स्वास्थ्य सर्वे (एनएफएचएस-4) के आंकड़े बताते हैं कि राजस्थान में 20 से 24 वर्ष आयु की विवाहित महिलाओं में से 35 प्रतिशत का विवाह उनके 18 साल की आयु होने से पहले ही कर दिया गया था। इसका नतीजा ये रहा कि सर्वे के समय 15 से 19 साल की उम्र वाली 6 प्रतिशत किशोरियां या तो मां बन चुकी थीं या फिर गर्भवती थीं। जबकि सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे रिपोर्ट 2016 के अनुसार 5 साल से कम उम्र की बच्चियों की मृत्यु दर 49 प्रति हजार जीवित जन्म है। ठीक इसी तरह शिक्षा की वार्षिक स्थिति रिपोर्ट के अनुसार स्कूल में प्रवेश लेने वाली प्रत्येक पांच लड़कियों में से एक लड़की 15-16 साल की उम्र तक होते-होते स्कूल जाना छोड़ देती है। जबकि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे 2015-16 के अनुसार 6 साल या उससे ज्यादा उम्र की लगभग 43 प्रतिशत बच्चियां कभी स्कूल गई ही नहीं।