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पेटेंट के नाम पर खेतों में जड़े जम रही बड़ी कंपनियां

Anoop Singh

Publish: Oct 20, 2019 17:52 PM | Updated: Oct 20, 2019 17:52 PM

Jaipur

बीज पर किसका हक: किसानों पर मार, खाद्य सुरक्षा संकट में

 

 

नई दिल्ली.

कॉरपोरेट घुसपैठ अब खेतों में हो गई है। मुनाफे की खेती के फेर में बहुराष्ट्रीय कंपनियां फसली बीजों पर पेटेंट के जरिए काबिज हो रही हैं। बीज पर अब कंपनियों का एकाधिकार हो रहा है। यानी प्राकृतिक संसाधन सिमट कर नफा-नुकसान के फेर में हैं। अन्नदाता के पास अब अपने खेत में बीज रोपने का अधिकार भी छिनता जा रहा है। पूरी दुनिया में पौधों और पौधों से जुड़े जैविक अधिकारों पर बहस छिड़ी हुई है। आखिर बीज पर किसका अधिकार, किसान अथवा बहुराष्ट्रीय कंपनियों का? तस्वीर इसलिए भी भयावह हो सकती है क्योंकि खाद्य सुरक्षा भी संकट में है।


प्राकृतिक संसाधनों पर निजी कंपनियां काबिज
जीन एथिकल नेटवर्क नामक एनजीओ के जूडिथ डॉशबर्ग का कहना है कि समूची मानवता के जो प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध हैं उन पर अब निजी कंपनियों का एकाधिकार हो गया है।

पेटेंट का सिलसिला
अमरीका ने 1980 के दशक में जैविक पेटेंट की अवधारणा की शुरुआत की। अन्य पश्चिमी देशों ने भी इसका अनुसरण किया। 1990 में 120 पेटेंट की तुलना में आज 12,000 जैविक पेटेंट हैं।

क्या होता है पेटेंट से
-पौधे के पेटेंट से बुवाई, पैदावार और बिक्री का स्वामित्व पेटेंटकर्ता के पास चला जाता है।
- इससे पेटेंट वाले बीज अथवा पैदावार को किसान अपने खेत में बो नहीं सकता न ही बेच सकता है।
- कीटरोधी फसलों के बीज का पेटेंट पाने के बाद मोनसेंटो जैसी बड़ी कंपनियां ही इन बीजों की ब्रिकी करती है।

पेटेंट और विरोधाभासी हालात
पेटेंट से कई बार विरोधाभासी हालात भी पैदा हो जाते हैं। पैटेंट वाले पौधे के परागकण हवा और पानी से भी फैल जाते हैं। 2004 में मोनसेंटो ने कनाडा के एक किसान को सोयाबीन की फसल उगाने पर कोर्ट में वाद दायर किया। किसान ने तर्क दिया कि जैनेटिकली मॉडीफाइड पोलन (परागकण) से उसकी सोयाबीन की पैदावार प्रभावित हुई। कोर्ट ने किसान को राहत प्रदान की।

भारत में बीज का बाजार
6.45 लाख करोड़ रुपए का होगा 2024 में
4.30 लाख करोड़ रुपए का था 2018 में
50 फीसदी वैश्विक बीज बाजार पर बेयर-मोनसेंटो, ड्यूपोंट व स्यनजेंटा कंपनी कब्जा