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कांग्रेस के बाद अब भाजपा में, ये क्या चल रहा...

Prakash Kumawat

Publish: Oct 25, 2019 19:48 PM | Updated: Oct 25, 2019 20:02 PM

Jaipur

Groupism in bjp : राजस्थान भाजपा की अंदरुनी गुटबाजी को लेकर पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व चितिंत है।

जयपुर

Groupism in bjp : राजस्थान भाजपा की अंदरुनी गुटबाजी को लेकर पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व चितिंत है। पार्टी मुख्यालय में दो दिन पहले हुई सांसदों और विधायकों की बैठक से कुछ बड़े नेताओं ने दूरी बनाकर इस बात के फिर संकेत दिए कि प्रदेश भाजपा में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। स्थानीय निकाय चुनावों की तैयारी के नाम पर बुधवार को हुई भाजपा के सांसदों—विधायकों की बैठक में निकाय चुनाव प्रणाली का विरोध करने का निर्णय लेने के साथ ही सांसदों—विधायकों को बेहतर तालमेल से काम करने की सीख भी दी गई। ऐसी ही सीख पिछली भाजपा सरकार के समय कई मीटिंगों में दी गई थी। राष्ट्रीय पदाधिकारियों ने उस वक्त चेतावनी भी दी थी, लेकिन नेताओं पर उसका असर नहीं हुआ था। नतीजा यह रहा कि विधानसभा चुनाव में भाजपा को सत्ता से हाथ धोना पड़ा था। इससे सबक लेते हुए भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने डेमेज कंट्रोल के प्रयास अभी से शुरु कर दिए हैं। यही कारण है कि बैठक तो बुलाई थी निकाय चुनाव की तैयारी के लिए, लेकिन हालात विधानसभा चुनाव जैसे न हो जाए, इस डर से उसमें चर्चा सांसद—विधायक और पदाधिकारियों में बेहतर समन्वय पर भी की गई। राष्ट्रीय संगठन मंत्री की मौजूदगी में उन्हें तालमेल से काम करने की घुट्टी भी पिलाई गई।

पार्टी सूत्रों का कहना है कि सतीश पूनिया के प्रदेशाध्यक्ष बनने के बाद से एक धड़े के कुछ नेताओं की नाराजगी लगातार देखने को मिल रही है। वे पार्टी कार्यक्रमों से दूरी बनाकर इसके संकेत भी दे रहे हैं। जिस तरह से कांग्रेस में डिप्टी सीएम सचिन पायलट सहित कई नेता निकाय चुनाव प्रणाली को लेकर अपनी सरकार के फैसलों के खिलाफ मुखर हो रहे हैं। ठीक उसी तरह के विरोधी स्वर भाजपा में न उठने लगे, इस डर से पार्टी ने अभी से डेमेज कंट्रोल के प्रयास भी शुरू कर दिए गए है। सांसदों की विधायकों की बैठक के बहाने जयपुर आए राष्ट्रीय संगठन मंत्री वी सतीश ने इस बात की भी थाह ली कि कौन कौन से दिग्गज नेता इस वक्त पार्टी कार्यक्रमों से दूरी बना कर चल रहे हैं। बैठक में वसुंधरा राजे, दुष्यंत सिंह राज्यवद्र्धन सिंह राठौड़, दीया कुमारी, जसकौर मीणा, किरोड़ी लाल मीणा जैसे नेताओं शामिल नहीं होने के बाद जहां राजनीतिक गलियारों में तरह तरह की चर्चाओं के दौर शुरू हो चुके हैं। वहीं शीर्ष स्तर पर इस पर मंथन चल रहा है।
पार्टी पदाधिकारियों का कहना है कि विधानसभा उपचुनाव के टिकट वितरण से एक क्षेत्र में गुटबाजी उस समय और बढ़ गई जब सांसद के परिजनों को टिकट देने से शीर्ष नेतृत्व ने यह कहकर इंकार कर दिया कि पार्टी में परिवारवाद को बढ़ावा नहीं दिया जाएगा। इसका असर यह रहा कि मंडावा में भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा। उन बूथों पर भी प्रत्याशी को कम वोट मिले जिनमें विधानसभा और लोकसभा में अच्छी बढ़त मिली थी। प्रदेश में विधानसभा चुनाव हारने के बाद हुई समीक्षा में यह सामने आया था कि यदि सांसदों—विधायकों, पदाधिकारियों में बेहतर तालमेल होता तो प्रदेश में भाजपा की सरकार बन सकती थी। विधायक—सांसदों की बैठक के बाद भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया ने कहा कि इस में विधायक, सांसदों में बेतहर तालमेल के साथ काम करने पर भी चर्चा हुई है।

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