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पूर्व सीएम को मुफ्त सुविधा बंद करने के आदेश की पालना क्यों नहीं हुई ? हाईकोर्ट

Mukesh Sharma

Publish: Nov 18, 2019 19:04 PM | Updated: Nov 18, 2019 19:04 PM

Jaipur

(Rajasthan Highcourt)हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव और राज्य सरकार को (notices)नोटिस जारी कर पूछा है कि पूर्व सीएम को मुफ्त में आजीवन सरकारी बंगला, ड्राइवर व वाहन सहित नौ जनों का स्टॉफ मुहैया कराने के संशोधित कानून को रद्द करने के आदेश का पालन नहीं होने पर क्यों ना उनके खिलाफ (Contempt) अवमानना कार्रवाई शुरु की जाए ?

जयपुर

न्यायाधीश गोवर्धन बाढ़दार और न्यायाधीश अभय चतुर्वेदी की बैंच ने यह अंतरिम निर्देश सोमवार को मिलापचंद डांडिया की अवमानना याचिका पर दिया। एडवोकेट विमल चौधरी ने बताया कि हाईकोर्ट ने 4 सितंबर के आदेश से संशोधित कानून को असंवैधानिक व गैर-कानूनी घोषित किया था। लेकिन इस राज्य सरकार ने इस आदेश का पालन नहीं किया और पूर्व सीएम को दी गई सुविधाओं को अभी तक वापस नहीं लिया है।

यह था हाईकोर्ट का आदेश-

हाईकोर्ट ने प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्रियों को राजस्थान मंत्री वेतन संशोधित अधिनियम 2017 के सेक्शन 7 बीबी व 11 (2) के तहत आजीवन सरकारी आवास, ड्राइवर सहित वाहन और नौ जनों का स्टाफ मुहैया कराने के प्रावधान को संविधान के समानता के अधिकार के विपरीत व मनमाना घोषित कर रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में देश के सभी नागरिकों को समानता का अधिकार दिया है। ऐसे में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री भी देश के अन्य लोक सेवकों व आम नागरिक के समान ही हैं। इन्हें संशोधित अधिनियम के तहत आजीवन सुविधाएं मुहैया कराया जाना गलत व असंवैधानिक है।

यह है मामला-
पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने राजस्थान मंत्री वेतन अधिनियम-1956 में संशोधन करके धारा 7(बीबी) के तहत राज्य में लगातार पांच साल तक मुख्यमंत्री रहने वाले को मुफ्त में मुख्यमंत्री या मंत्री के समान बंगला,राज्य और राज्य के बाहर भी स्वयं व परिवार के लिए ड्राइवर सहित सरकारी कार,बंगले पर टेलिफोन व संचार की सभी सुविधाएं और दस कर्मचारियों का स्टॉफ देने का प्रावधान कर दिया था। इन सुविधाओं को नहीं लेने या नहीं मिलने पर इन सुविधाओं पर खर्च होने वाली राशि के समान राशि देने का भी प्रावधान था।

इसके साथ ही पांच साल से कम समय के लिए मुख्यमंत्री रहने वालों को धारा-11(2) के तहत इस संशोधन से पहले मिल रही मुफ्त सरकारी सुविधाओं को जीवनभर जारी रखने का प्रावधान कर दिया था। राज्य के वरिष्ठ पत्रकार मिलापचंद डंडिया और विजय भंडारी ने जनहित याचिका के जरिए इस संशोधन विधेयक को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने लोक प्रहरी की याचिका पर यूपी और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगले देने के प्रावधान को असंवैधानिक घोषित कर चुका है।

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