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बस्तर में मिली ऐसी तितली, जो बस्तर से हिमालय के रिश्ते को दर्शाती है, जानिए इस तितली की खासियत

Badal Dewangan

Publish: Aug 18, 2019 17:06 PM | Updated: Aug 18, 2019 17:06 PM

Jagdalpur

Chhattisgarh Unique Story : बस्तर में वैगरेंट बटरफ्लाई (Vagrans egista) मिली है, इसका बस्तर का हिमालय माउंटेन (himalaya mountain) से लिंक हो सकता है, इसकी खोज वाइल्ड लाइफ (Wild life) पर शोध करने वाली एक टीम ने की है।

Chhattisgarh Unique Story : जगदलपुर. कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान के तहत आने वाले कुरंदी फॉरेस्ट रेंज में हिमालयन वैगरेंट बटरफ्लाई (Vagrans egista) पाई गई है। इस तितली का यहां मिलना बेहद खास माना जा रहा है, क्योंकि इससे एक नए शोध का विषय उत्पन्न हो गया है। दरअसल वाइल्ड लाइफ रिसर्चर अनुपम सिसोदिया और रवि नायडू ने अपने शोध में पाया कि यह तितली यहां हिमालयन वैली से ईस्टर्न घाट के रास्ते पहुंची है। ऐसे में इस बात को बल मिल रहा है कि बस्तर के कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान के जंगल हिमालयन वैली के टच में हैं या दोनों के बीच में ईस्टर्न घाट की वजह से लिंक जरूर है। रिसर्च टीम के अनुपम सिसोदिया ने पत्रिका को बताया कि यह शोध का विषय है फिलहाल हम इस पर कुछ भी स्पष्ट तौर पर नहीं कह सकते, लेकिन प्रारंभिक तौर पर जो बातें सामने आ रही हैं, उससे यही लग रहा है कि हिमालयन वैली का ओडिशा के ईस्टर्न घाट के जरिए बस्तर के जंगल से जुड़ाव है। इस पर शोध होना अभी बाकी है।

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मध्य भारत की 148वीं तितली की खोज पूरी
हिमालयन वैगरेंट बटरफ्लाई मध्य भारत की १४८वीं तितली रिकॉर्ड की गई है। वहीं अकेले कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान में दर्जनभर से ज्यादा तितलियां रिकॉर्ड की गई हैं। वैगरेंट बटरफ्लाई कुरंदी के जंगल मिली है, जहां साल और बांस का जंगल हैं। यह इलाका इस प्रजाति की तितली के लिए मुफीद माना जा रहा है। यहां इसे सर्वाइव करने में किसी तरह की दिक्कत नहीं होगी। इससे पहले यह झारखंड और ओडिशा के जंगलों में रिकॉर्ड की गई थी। छत्तीसगढ़ में पहली बार इसे खोजा गया है।

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बस्तर में जैव विविधता बढऩे की संभावना
ओडिशा के ईस्टर्न घाट के जरिए हिमालयन वैली से बस्तर के जंगल जुडऩे से यहां जैव विविधता में इजाफा होगा। पहले ही यहां जैव विविधता में व्यापकता है, ऐसे में अगर हिमालयन वैली से लिंक हो जाता है तो निश्चित रूप से यहां जैव विविधता बढ़ेगी। जानकारों का मानना है कि ज्यादातर पक्षी यहां माइग्रेट होकर पहुंचेंगे। इससे कांगेर वैली के जंगल और भी ज्यादा जैव संपन्न हो सकते हैं।

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