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बड़ी खबर : संयुक्त राष्ट्र संघ समेत अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के 70 देश अपनाएंगे इंदौरी तकनीक

Hussain Ali

Publish: Aug 19, 2019 09:27 AM | Updated: Aug 19, 2019 09:26 AM

Indore

गीला कचरा निपटाने के लिए इंदौर के बायोमेथेनाइजेशन प्लांट की तकनीक को संयुक्त राष्ट्र संघ लागू करवाएगा अन्य देशों में

 

इंदौर @ नितेश पाल. सफाई के मामले में पूरे देश में सबसे आगे रहने वाले इंदौर में गीले कचरे के निपटान की तकनीक का इस्तेमाल अब अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ ही जापान के छोटे शहरों के कचरे के निपटान के लिए भी किया जाएगा। इंदौर में गीले कचरे के निपटान के लिए अपनाए गए बायोमेथेनाइजेशन प्लांट को संयुक्त राष्ट्र संघ की मदद से अफ्रीका और दक्षिण-पूर्वी एशिया और जापान अपने यहां इस्तेमाल करेगा। जापान के टोक्यो में इंटरनेशनल फोरम फॉर सस्टेनेबल एशिया और पेसिफिक की बैठक में इसको लेकर निर्णय हुआ।
जापान के टोक्यो में हुई कॉन्फ्रेंस के दौरान शहरों से निकलने वाले कचरे को लेकर पूरा सेशन रखा गया था। इसमें इंदौर में कचरे के निपटान को लेकर किए गए काम पर भी चर्चा की गई। इंदौर के वेस्ट मैनेजमेंट सलाहकार अशद वारसी ने इंदौर में किए गए काम को सबके बीच रखा। इसमें गीले कचरे को जीरो वेस्ट के साथ खत्म करने की इंदौरी तकनीक न सिर्फ कचरे का पूरी तरह से निपटान करती है, बल्कि दूसरी तकनीक से सस्ती भी है। इसके बाद तय किया गया कि इंदौर की तकनीक को संयुक्त राष्ट्र संघ के जरिये एशिया महाद्वीप के 59 देशों के साथ ही दक्षिण-पूर्वी एशिया के 11 देशों में भी इस्तेमाल करते हुए वहां भी इसी तरह के प्लांट लगाए जाएंगे।

इंदौरी तकनीक सबसे सस्ती

- बायोमेथेनाइजेशन की इंदौरी तकनीक और प्लांट को छोटे स्तर पर भी लगाया जा सकता है। इसको 20 टन से लेकर 500 टन तक कचरे के निपटान के लिए डिजाइन किया जा सकता है जबकि कचरा खत्म करने के दूसरे प्लांट जिसमें वेस्ट टू एनर्जी (कचरे से खाद बनाने की तकनीक) के प्लांट कम से कम 200 टन कचरे के निपटान के लिए लगते हैं।
- इंदौर की तकनीक काफी सस्ती है। इंदौर में गीले कचरे के लिए लगाया गया बायोमेथेनाइजेशन के 25 टन क्षमता के प्लांट ने लगभग 9 करोड़ रुपए में ही काम करना शुरू कर दिया जबकि वेस्ट टू एनर्जी प्लांट कम से कम 200 से 250 करोड़ की लागत में बनता है।
- इंदौर में कचरे के प्लांट को चलाने में किसी तरह का प्रदूषण नहीं होता है। कचरे के निपटान के लिए 100 टन कचरे के निपटान में केवल 8 हजार लीटर पानी लगता है। इसमें से भी अधिकतर पानी कचरे में से ही निकलता है और यही पानी दोबारा इस्तेमाल हो जाता है जबकि दूसरे प्लांट में वायु और जल प्रदूषण की संभावना सबसे ज्यादा होती है।
- इंदौरी तकनीक जीरो वेस्ट तकनीक है। इसके प्लांट में किसी तरह का कचरा नहीं बचता है। कचरे से गैस बनाने के बाद खाद बचती है जबकि वेस्ट टू एनर्जी प्लांट में बचने वाली राख का कोई इस्तेमाल नहीं होने के कारण इसे जमीन में ही डंप करना होता है।

इंदौर के प्लांट और यहां की तकनीक को सभी देशों के बीच रखा था। इसके बाद इंदौर की जीरो वेस्ट तकनीक को दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीकन देशों में लगाने पर सहमति बनी है। इंदौर की तकनीक को अब वहां भी लागू किया जाएगा।
अशद वारसी, वेस्ट मैनेजमेंट सलाहकार, इंदौर