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बयान से बदले पार्षद, कोर्ट ने कहा- मुद्दई सुस्त, गवाह चुस्त

Hussain Ali

Publish: Jul 19, 2019 16:05 PM | Updated: Jul 19, 2019 16:05 PM

Indore

चार साल पहले भाजपा के प्रेम जारवाल ने की थी हमले की रिपोर्ट

इंदौर.चार साल पहले जमीन विवाद में अपने ऊपर जानलेवा हमले की रिपोर्ट करवाने वाले भाजपा पार्षद कोर्ट में अपने ही बयान से मुकर गए। उनके बयानों से हमलावरों का फायदा हुआ और कोर्ट को सभी आरोपियों को बरी करना पड़ा, लेकिन कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मामला 'मुद्दई सुस्त और गवाह चुस्त' जैसा है।

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3 जुलाई, 2015 को थाना तुकोगंज में वार्ड-46 के पार्षद प्रेम जारवाल ने अंगद भदौरिया, जोहेब खान, अशोक जारवाल, पवन मिमरोट, निर्मल मेहरा, महेंद्र मुराडिय़ा, अशोक टटवाड़े और गणपत जारवाल के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवाई थी कि खसरा नंबर 56/2, पंचम की फैल के दक्षिण कंपाउंड में मुन्ना कबाड़ी और सचिन कुन्हारे के साथ गए थे। वहां कुछ मजदूर मुरम फैला रहे थे। उन्होंने जमीन का केस कोर्ट में चलने का बताकर रोका तो आरोपितों ने उन्हें धमकाया, गाली-गलौच की और गार्ड अंगद ने अपनी लाइसेंसी बंदूक से उनके ऊपर गोली चला दी। पुलिस ने हत्या के प्रयास और बलवा का केस दर्ज कर मार्च, 2016 में कोर्ट में चालान पेश किया।

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कोर्ट में तीन साल मामला चला और इस दौरान पार्षद जारवाल ही पुलिस को दिए बयान से मुकर गए। कोर्ट में बयान दिया कि दक्षिणी कंपाउंड में मुरम फैलाने की सूचना पर वह वहां गया था और मना करके वापस आ गया। इसके बाद कंपाउंड से गोली चलने की आवाज आई, लेकिन उसे नहीं मालूम कि गोली किसने चलाई। साथ ही अंगद और जोहेब के अलावा किसी और के वहां उपस्थित होने से भी इनकार कर दिया। अभियोजन ने जारवाल को पक्षद्रोही घोषित कर दिया, लेकिन अन्य गवाहों ने वही बयान दिया, जो पुलिस को बताया था। इस पर कोर्ट ने भी टिप्पणी करते हुए कहा कि इस मामले में मुद्दई सुस्त और गवाह चुस्त वाली कहावत चरितार्थ हो रही है।

अशोक ने निर्दलीय लड़ा था चुनाव

इस मामले में एक आरोपित अशोक जारवाल ने प्रेम के खिलाफ निर्दलीय चुनाव लड़ा था और दोनों में उस समय से खींचतान चल रही थी। इसके बावजूद प्रेम का अदालत में पलटना अभियोजन के वकीलों को समझ नहीं आया। हालांकि अन्य गवाहों ने सरकारी वकीलों का साथ दिया और घटना को उसी स्वरूप में बताया, जैसी एफआईआर में लिखवाई गई थी, लेकिन प्रेम जारवाल के बयानों के बाद कोर्ट ने इसे पूरी तरह विश्वसनीय नहीं माना और संदेह का लाभ आरोपितों को मिल गया और सभी छूट गए।