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नहीं मिल रही वन विभाग की अनुमति

Zakir Pattankudi

Publish: Jul 17, 2019 20:03 PM | Updated: Jul 17, 2019 20:03 PM

Hubli

नहीं मिल रही वन विभाग की अनुमति
-लोण्डा-मडगांव दोहरीकरण योजना में हो रही देरी
-वन भूमि परिवर्तन के लिए आवेदन

हुब्बल्ली

नहीं मिल रही वन विभाग की अनुमति
हुब्बल्ली
वन एवं वन्यजीव विभाग की अनुमति नहीं मिलने के कारण लोण्डा-मडगांव दोहरीकरण योजना लागू करने में देरी हो रही है।
होसपेट-वास्को रेल मार्ग दोहरीकरण योजना वर्ष 2011 में ही जारी हुई है। होसपेट से हुब्बल्ली तक तथा धारवाड़ से लोण्डा तक रेल मार्ग दोहरीकरण कार्य पूरा हुआ है। इसी योजना के भाग के तौर पर लोण्डा-मडगांव के बीच 84 किलोमीटर मार्ग दोहरीकरण के लिए 1,197 करोड़ रुपए की योजना गठित की गई है परन्तु इसके लिए अभी तक अनुमति नहीं मिली है।


वन भूमि परिवर्तन के लिए आवेदन


उत्तर कन्नड जिले के हलियाल वन क्षेत्र में 0.88 हेक्टेयर तथा दांडेली वन्यजीव बाघ संरक्षित अभयारण्य में 9.57 हेक्टेयर समेत कुल 10.45 हेक्टेयर, गोवा में 122.78 हेक्टेयर वन भूमि को इस्तेमाल के लिए अनुमति देने की मांग को लेकर दक्षिण पश्चिम रेलवे ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को 2017 से पृथक तौर पर विभिन्न विभागवार आवेदन सौंपा है। इसके अलावा दांडेली तथा गोवा के वन्यजीव विभागों की भी अनुमति मांगी है परन्तु अभी तक आवेदन वन अधिकारियों के स्तर पर ही समीक्षा में हैं। पर्यावरण की अनुमति के लिए आवेदन सौंपना है।


हुब्बल्ली-अंकोला के लिए विकल्प


उत्तर कर्नाटक के वाणिज्य विकास के लिए जरूरी बंदरगाह को संपर्क उपलब्ध करने वाला समीप का मार्ग यह है। हुब्बल्ली-अंकोला रेल मार्ग निर्माण कार्य विभिन्न कारणों से लंबित पड़ा है। कर्नाटक के बेलेकेरी बंदरगाह बदनाम हुआ है। इस के चलते उद्योगों को अयस्क खनिज तथा अन्य कारोबार के लिए वास्को बंदरगाह का चयन करना अनिवार्य हो गया है। हुब्बल्ली-वास्को मार्ग पर कई वर्षों से माल गाडियां चल रही हैं परन्तु घाटी क्षेत्र से होकर मार्ग गुजरने से अधिक ट्रेनों की आवाजाही सम्भव नहीं हो रही है। आय दुगनी करने के लिए दपरे ने रेल मार्ग दोहरीकरण की योजना तैयार की। यहां अयस्क खनिज ही नहीं कोयला, लकड़ी आदि वस्तुओं के परिवहन के लिए भी अधिक सुविधा होगी।


कई चुनौतियां


दपरे के एक अधिकारी का कहना है कि दपरे के लिए यहां रेल मार्ग दोहरीकरण कार्य करना बड़ी चुनौती बना हुआ है। मौजूदा रेल पटरी को छोड़कर दूसरा सड़क मार्ग यहां नहीं है। हमेशा पानी टपकने वाले ठोस पथरों की सुरंगें यहां हैं। इन्हें काटकर दूसरी पटरी बिछाने के लिए कम से कम छह से सात वर्ष चाहिए।


254 करोड़ रुपए आय की उम्मीद


रेल विभाग की ओर से पर्यावरण मंत्रालय को सौंपे शपथपत्र में कहा है कि इस योजना से किसी भी जन आबादी क्षेत्र को नुकसान नहीं होगा। निजी जमीनों का अधिग्रहण करने की जरूरत नहीं है। फिलहाल एक रेल पटरी है, इसके बगल में ही एक और पटरी बिछाने पर कम खर्च में योजना गठित की जा सकती हैं। इस योजना से वन तथा वन संपदा को लगभग 28.12 करोड़ रुपए का नुकसान होगा परन्तु माल गाडिय़ों की आवाजाही तीन गुना बढ़ेगी। इससे हर वर्ष सीधे तौर पर 254 करोड़ रुपए का आय प्राप्त होगा। वैकल्पिक तौर पर लगभग 18 हजार लोगों को रोजगार मिलेगा। पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।


ढलान में जाती पटरी


इतिहास बताता है कि 16वीं सदी में गोवा पर शासन करने वाले पुर्तगालियों ने कैसलरॉक-मडगांव के बीच रेल पटरी का निर्माण किया। भारत को आजादी मिलने के कुछ वर्षों के बाद भी यह पटरी पुर्तगालियों के कब्जे में ही थी। गोवा की आजादी के बाद भारतीय रेल के कब्जे में आई। 1998 में कोंकण रेल मार्ग कार्य आरम्भ करने के बाद यहां यात्री रेलगाडिय़ों की आवाजाही आरम्भ हुई। कैसलरॉक से कुलेम तक लगभग 25 किलोमीटर रेल मार्ग पर कई सुरंगे हैं। पत्थर से निर्मित पुल ध्यान आकर्षित करते हैं। कर्नाटक तथा गोवा की सीमा पर ब्रगांजा घाट नामक पश्चिम घाट के बीच टेडे मेडे मार्ग पर यह रेल पटरी गुजरती है। इस दूरी को पार करने में ट्रेनों को चार घंटे लगते हैं। आमतौर पर ट्रेनें समतल इलाकों में गुजरती हैं परन्तु कैसलरॉक से कुलेम तक लगभग पांच किलोमीटर ढलान में ट्रेन गुजरती है। इसके चलते ब्रेक लगाने में सुविधा के लिए एक ही ट्रेन को तीन-चार इंजन लगाकर चलाया जाता है। यहां खूबसूरत दूधसागर जलप्रपात है।