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दिल्ली में प्रदूषण फैला रही पराली से यहां बनाई जा रही बिजली

Manoj Goyal

Publish: Nov 08, 2019 11:31 AM | Updated: Nov 08, 2019 11:31 AM

Hanumangarh

प्रत्येक वर्ष छह करोड़ यूनिट बिजली का हो रहा उत्पादन

ग्रीन एनर्जी प्लांट से दूर हो सकती है परेशानी

प्रतिवर्ष तीन लाख क्विंटल पराली की हो रही खरीद

 

संगरिया. दिल्ली सहित पूरे उत्तर भारत में बढ़े प्रदूषण के स्तर के लिए पंजाब, हरियाणा व राजस्थान के किसानों के धान की पराली जलाने को बड़े स्तर पर जिम्मेदार माना जा रहा है। इन सबके मध्य राजस्थान में 2011 से स्थापित ग्रीन एनर्जी संजोग पावर प्लांट देश के लिए अनूठी मिसाल बना हुआ है। यहां रतनपुरा औद्योगिक क्षेत्र (रिको) स्थित 10 मेगावाट क्षमता के संजोग पावर प्लांट में प्रतिवर्ष तीन लाख क्विंटल से अधिक पराली की खरीद कर विद्युत उत्पादन किया जा रहा है।

यहां पराली, सरसों का गुना सहित अनेक एग्रीकल्चर वेस्ट को जलाकर बिजली बनाई जाती है। जहां किसानों के पराली को सीधे जलाने से प्रदूषण होता है तथा दिल्ली जैसे हालात बन रहे हैं, वहीं इस प्रकार के प्लांट समस्या के समाधान की राह दिखा रहे हैं। इससे विद्युत उत्पादन के साथ-साथ पर्यावरण प्रदूषण रोकने व पर्यावरण संरक्षण करने में सहायता मिल रही है।


संजोग पावर प्लांट के एमडी प्रहलाद झींझा ने बताया कि 2011 में स्थापित इस प्लांट में एक जनवरी 2016 से निरंतर विद्युत उत्पादन जारी है। राजस्थान सरकार को सप्लाई दी जा रही है। इस बायोमास पावर प्लांट से प्रतिमाह औसतन पचास लाख व प्रतिवर्ष छह करोड़ यूनिट से अधिक विद्युत का उत्पादन हो रहा है। वर्तमान में तीन से साढ़े तीन हजार क्विंटल पराली की प्रतिदिन खरीद की जा रही है। इसे गांठ व कुत्तर के रूप में स्थिति अनुसार 130-170 रुपए प्रति क्विंटल की दर से खरीदा जा रहा है।(नसं.)


बन सकता है आय का माध्यम
पावर प्लांट के रोहित मक्कासर ने बताया कि पराली समस्या के स्थान पर किसानों के लिए अतिरिक्त आय का माध्यम बन सकता है। इसके लिए 10 से 12 किसानों की ओर से साझा तौर पर गांठ बनाने वाली मशीन की खरीद कर पराली को बेचने का कार्य किया जा सकता है। प्रति बीघा औसतन 20 से 25 क्विंटल पराली होती है। इससे सहकारी सिस्टम के अनुरूप बचत कर सकते हैं।

यहां राजस्थान, पंजाब वं हरियाणा तीनों राज्यों के किसानों से पराली की खरीद की जा रही है। सीधे गांठ बनाकर रखी पराली का एक वर्ष तक स्टॉक रखा जा सकता है। अभी तक इस कार्य में किसानों के स्थान पर मशीन वाले ठेकेदार व व्यापारी ही जुड़े हुए हैं।(नसं.)


तीस प्रतिशत हिस्सा पराली का
प्लांट में विद्युत उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाले बायोवेस्ट में तीस प्रतिशत हिस्सा पराली का रह रहा है। प्रतिवर्ष कुल दस लाख क्विंटल फ्यूल की आवश्यकता यहां रहती है। इसमें तीन लाख क्विंटल की हिस्सेदारी अकेले पराली की ही होती है। किसानों की जागरुकता के साथ-साथ यह मात्रा बढ़ रही है। पर्यावरण प्रदूषण पर भी कुछ नियंत्रण लग रहा है।(नसं.)

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