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मौत की सुंदर यात्रा का महाकाव्य गाती है 80 वर्षीय तेरोनपी

Yogendra Yogi

Publish: Sep 30, 2019 18:24 PM | Updated: Sep 30, 2019 18:24 PM

Guwahati

मरने के बाद घरों में शोक गीत गाने की परंपरा कई समुदायों में हैं। तेरोनपी महिला शोक गीत गायिका है। कार्बीं समुदाय में किसी की मौत के बाद उसकी महत्वपूर्णं भूमिका है। कार्बीं समुदाय पूर्वोत्तर की सबसे बड़ा जनजाति है।

 

असम न्यूज, समाचार, खबर गुवहाटी

 

 

गुवाहाटी ( राजीव कुमार )। मरने के बाद घरों में शोक गीत गाने की परंपरा कई समुदायों में हैं। असम के कार्बीं समुदाय में भी यह परंपरा है। पिछले हफ्ते ही कसंग तेरोनपी के पड़ोस में एक व्यक्ति मरा तो उसे वहां जाने का बुलावा आ गया। कार्बीं आंग्लांग जिले के डिफू के पास तारालांग्सो की अस्सी साल की तेरोनपी के लिए यह कोई नई बात नहीं है। तेरोनपी कहती है यदि हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा। तेरोनपी महिला शोक गीत गायिका है। कार्बीं समुदाय में किसी की मौत के बाद उसकी महत्वपूर्णं भूमिका है। कार्बीं समुदाय पूर्वोत्तर की सबसे बड़ा जनजाति है।

कार्बी समुदाया में है शोकगीत की पंरपरा
तेरोनपी कहती है कि जब वह दस साल की थी तभी से शोक गायिका बनने का ख्वाब देखती थी। जब उसका एक रिश्तेदार मारा गया तो उसने कार्बी लोगों की मौत पर गाया जानेवाला महाकाव्य केचारेह अलून सुना था। वह कहती है कि मैं कभी स्कूल नहीं गई। मैंने लिखना-पढऩा नहीं सीखा। इसलिए मैंने सोचा कि मैं शोक गीत गाने की कला सीख लूं। तेरोनपी आगे कहती है कि जिस लांगोकसो गांव में मैं पली बढ़ी वहां केचारेह अलून का गाना शिक्षा के क्षेत्र में स्नातक होने के बराबर है। जैसे ही मैंने शादी की मैं इसे पूरी तरह याद रखने लगी।

वृद्धा तेरोनपी सुनाती है शोक का महाकाव्य
कार्बी जनजाति के मौत के रस्म रिवाजों के अनुसार किसी व्यक्ति की मौत पर केचारेह अलून गाया जाए तो मृत व्यक्ति की आत्मा पुरखों (मृत व्यक्तियों के गांव) के साथ जाकर मिल जाती है। यदि यह नहीं किया जाता है तो आत्मा भटकते रहती है। इसलिए कार्बी समुदाय के अंतिम संस्कार में इस परंपरा को कभी नहीं भूला जाता। पिछले दो सालों से तेरोनपी शोधकर्ताओं के साथ इसके संरक्षण पर काम कर रही है। इसके लिए वे कार्बी आंग्लांग के एकांत जंगलों में उनके साथ घूमी है। नियम के अनुसार शोक गीतों को गांव की सीमा में ऐसे ही गाया नहीं जा सकता।

शोक महाकाव्य इलियड़ व ओडिसी से दुगना बड़ा है
डिफू के स्वतंत्र अनुसंधाकर्ता डी एस तेरन का कहना है कि हम सबने द इलियाद और द ओडिसी महाकाव्य के बारे में सुना है। पर हमें पता नहीं था कि हमारे पास भी एक मौखिक महाकाव्य है जो द इलियाद से दोगुना बड़ा है। वर्ष 2017 से तेरन कोहिमा इंस्टीट्यूट के माइकल हेनिस के साथ मिलकर केचाहेर अलून के संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं। अगस्त में इस गुट ने महाकाव्य की लिप्यंतरण करने में सफलता पाई है। अंग्रेजी किताब के रुप में प्रकाशित होने के पहले इसका भाषातंर किया गया है।

शोधकर्ता कर रहे हैं संरक्षण
तेरन कहते हैं कि कार्बी संस्कृति के संरक्षण में यह मील का पत्थर साबित होगा। हम यह सोचते हैं कि शोक गीत यूरोपीय सोच है। लेकिन हमारी किताब से इस पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध में मदद मिलेगी। केचारेह अलून वैसे तो व्यक्ति की मौत के तुरंत बाद गाया जाता है पर अंतिम संस्कार चोमानगकान में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। यह परंपरा मौत के कुछ दिन बाद या कुछ साल बाद भी की जाती है। चोमानगकान में शव नहीं होता। यह जैसे दूसरा अंतिम संस्कार है। इसमें सभी रस्में प्रतीकात्मक होती है। चरहेपी गीत के साथ रिश्तेदार जोर से विलाप करते हैं। पारंपरिक रोना प्रतीकात्मक नहीं होता,यह सही अर्र्थो में होता है। कार्बी आंग्लांग में सालों से चल रही इस परंपरा में काफी बदलाव आए हैं। क्योंकि यह लिखित में नहीं थे।

महाकाव्य पर ३२ घंटे वीडियो बनाया
महाकाव्य के लिए कार्बी भाषा में कई पुस्तकों का प्रयास हुआ है। अब यह अंग्रेजी में होने से व्यापक पाठक वर्ग के पास पहुंचेगी।19 दिनों में 32 घंटे का वीडियो बनकर तैयार है। तेरन कहते हैं कि हम भाषा जानते हैं लेकिन कई ऐसे शब्द आते हैं जो समझ से परे हैं। यह बेहद पुराने हैं। आज इन शब्दों का इस्तेमाल नहीं होता। पर जैसे जैसे हम समझते हैं हमारी आंखें खुली की खुली रह जाती है। टीम का हिस्सा रहे कवि लोंगबिर तेरांग कहते हैं कि जब हम घरों में रिकार्डिंग सुनते थे तो रिश्तेदार हमे वहां सुनने के बजाए कान में हेडफोन लगा लेने को कहते थे। पहले तो हम भी डरे हुए थे लेकिन जब महाकाव्य खुलता गया तो मौत की यात्रा की सुंदरता का पता चला। अब मुझे लगता है कि मृत्यु कुछ भी नहीं। तेरोनपी कहती है मौत दुखदायी है लेकिन इसे हमें स्वीकारना पड़ेगा।