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वेस्ट को बनाने में जुटे बेस्ट, पर्यावरण बचा तो लोगों को आया इंटरेस्ट

Nitin Bhal

Publish: Aug 14, 2019 22:49 PM | Updated: Aug 14, 2019 22:49 PM

Guwahati

North East: आज पूरी दुनिया में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने में प्लास्टिक का बड़ा हाथ है। यह ऐसा पदार्थ है जो न तो गलता है और ना ही सालों दफन रहने के बावजूद नष्ट...

इंफाल. आज पूरी दुनिया में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने में प्लास्टिक का बड़ा हाथ है। यह ऐसा पदार्थ है जो न तो गलता है और ना ही सालों दफन रहने के बावजूद नष्ट होता है। कई देशों में प्लास्टिक को बैन कर दिया गया है। भारत में भी प्लास्टिक एक समस्या है। ऐसे में प्लास्टिक बैग्स पर कई राज्यों में प्रतिबंध है। मणिपुर में एक वक्त था जब प्रति दिन कुल ठोस अपशिष्ट का 5 प्रतिशत प्लास्टिक होता था। नतीजतन, जून 2018 को राज्य में प्लास्टिक बैग के उपयोग को प्रतिबंधित कर दिया गया। हालांकि यह कदम भी प्लास्टिक कचरे से निपटने में पर्याप्त नहीं है। कई लोग हैं जो इससे निपटने में आगे आ रहे हैं।

राज्य में जन स्वास्थ्य आभियांत्रिकी विभाग के कर्मचारी 58 वर्षीय उषम कृष्णा सिंह भी उन्हीं में से एक हैं। उन्हें लगता था कि गांव-शहरों में फैली प्लास्टिक के बारे में भी कुछ किया जाना चाहिए। ऐसे में कृष्णा ने फैसला किया कि वह डिस्पोजेबल प्लास्टिक की बोतलों में से झाड़ू का निर्माण करेंगे। इस काम में उन्होंने अपने 30 वर्षीय बेटे उषम अशोक सिंह की सहायता ली। अशोक इंफाल में एक इलेक्ट्रॉनिक रिपेयरिंग की दुकान चलाते हंै।

शुरू में उड़ा मजाक

Making best out of trash, saving nature

कृष्णा ने बताया कि शुरू में कुछ लोगों ने मेरा मजाक उड़ाया। जब मैं अपने बैग में प्लास्टिक की बोतलों को सडक़ों से हटाकर इक_ा किया करता था तो लोग मुझ पर हंसते थे। लेकिन इसने मुझे हतोत्साहित नहीं किया। बल्कि, मैं खुद को अधिक प्रेरित महसूस करता था। समय के साथ मेरे गांव के लोगों ने मुझे समझा और अब कुछ लोग मेरे घर में प्लास्टिक की खाली बोतलें भी लाते हैं। इस प्रक्रिया के बारे में बताते हुए कृष्णा ने कहा कि वे चाकू का उपयोग करते हैं। जिसकी सहायता से प्लास्टिक की बोतलों को बहुत पतले टुकड़ों में काट दिया जाता है, लगभग धागे के रूप में। हॉट एयर-गन की मदद से प्लास्टिक के धागों को कठोर बना दिया जाता है। वह प्लास्टिक के धागों को पकडऩे के लिए बांस के डंडे का इस्तेमाल करते हैं। एक झाड़ू के निर्माण के लिए, एक लीटर क्षमता की 30 बोतलों की आवश्यकता होती है।

स्वयं सहायता समूह बनाया

Making best out of trash, saving nature

कृष्णा ने इस कार्य को बढ़ाने के लिए स्वयं सहायता समूह उषम बिहारी और मयपैक प्लास्टिक रिसाइकल उद्योग बनाया। करीब दस गांवों के लोग कृष्णा के साथ जुड़ कर प्लास्टिक कचरे का निस्तारण तो कर ही रहे हैं वहीं आमदनी भी कर रहे हैं। वर्तमान में डिस्पोजेबल प्लास्टिक की पानी की बोतलों और शीतल पेय प्लास्टिक की बोतलों का उपयोग करके दो प्रकार के झाड़ू बनाई जाती है। एक झाडू 150 रुपए में तो दूसरी 200 रुपए में बेची जाती है।

बढ़ा रहे क्षमता, जुड़ रहे लोग

Making best out of trash, saving nature

कृष्णा ने इस तकनीक को और विकसित किया है। अब वे एक इलेक्ट्रिक मोटर का का प्रयोग करते हैं जिसकी बदौलत अब हर दिन 20-30 झाड़ू का निर्माण किया जाता है। कृष्णा ने झाडू उत्पादन के लिए 20,000 रुपए का निवेश किया है। वह इस समय अपनी संस्था को एसएमइ के रूप में पंजीकृत करने की प्रक्रिया में है। कृष्णा प्लास्टिक रीसाइक्लिंग तकनीक के बारे में और भी सीख रहे हैं। जिससे कचरा समझे जाने वाला प्लास्टिक लोगों के काम आ सके।