स्लो इंटरनेट स्पीड होने पर आपको पत्रिका लाइट में शिफ्ट कर दिया गया है ।
नॉर्मल साइट पर जाने के लिए क्लिक करें ।

अब नवाचार से बदलेगी प्रदेश की शिक्षण व्यवस्था

Narendra Kushwah

Publish: Nov 02, 2019 13:16 PM | Updated: Nov 02, 2019 13:16 PM

Guna

- साउथ कोरिया से लौटकर आए दल के सदस्यों ने बताए अनुभव
- शिक्षण व्यवस्था देखने गया था 36 सदस्यीय दल
- साउथ कोरिया में शिक्षक की सैलरी और दर्जा सबसे ऊंचा
- स्कूली बच्चे खुद करते हैं सफाई
- शिक्षक पढ़ाने से ज्यादा प्रेक्टीकल पर देते हैं जोर

गुना. मप्र सरकार की पहल पर प्रदेश के अधिकारियों का 36 सदस्यीय दल बीते रोज साउथ कोरिया की पांच दिवसीय यात्रा पर गया था, जो हाल ही में लौट आया है। दल के सदस्यों ने अपना अनुभव बांटते हुए बताया कि उन्होंने दक्षिण कोरिया की शिक्षण व्यवस्था को नजदीक से देखा और समझा।

इसके बाद अधिकारियों ने एनालिसिस किया कि भारत और दक्षिण कोरिया की शिक्षण व्यवस्था में आज इतना अंतर क्यों है। हम दक्षिण कोरिया की शिक्षण व्यवस्था से क्या सीख कर अपने देश की शिक्षण व्यवस्था को और कैसे बेहतर बना सकते हैं।


जानकारी के मुताबिक मध्यप्रदेश सरकार ने शिक्षण व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन लाने के उद्देश्य से पहली बार 36 सदस्यीय अधिकारियों के दल को पांच दिवसीय प्रवास पर 20 से 24 अक्टूबर तक दक्षिण कोरिया भेजा था। इस दल में दो आईएएस, 12 प्रिंसीपल तथा 22 राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी शामिल थे। इनमें गुना के पूर्व कलेक्टर राजेश जैन, भिंड के पूर्व कलेक्टर इलैया राजा तथा प्रशासन अकादमी के डॉ बेडेकर का नाम शामिल है।

दक्षिण कोरिया की शिक्षण व्यवस्था में यह दिखा अलग
दक्षिण कोरिया के 5 दिवसीय प्रवास पर गए 36 सदस्यीय दल में शामिल गुना जिले के म्याना हायर सेेकेंडरी स्कूल के प्रिंसीपल हरिनारायण जाटव ने पत्रिका से खास बातचीत में बताया कि भारत और दक्षिण कोरिया की आजादी में ज्यादा दिनों का फर्क नहीं है।

जहां दक्षिण कोरिया को 15 अगस्त 1945 में आजादी मिली, वहीं भारत 15 अगस्त 1947 में आजाद हुआ। वर्तमान में साउथ कोरिया विकसित देश है तथा टेक्नोलॉजी सहित विभिन्न क्षेत्रों में काफी आगे है। खासकर दल के सदस्यों ने साउथ कोरिया की शिक्षण व्यवस्था को नजदीक से देखा और समझा तब पता चला कि हमारी शिक्षण व्यवस्था मौजूदा समय में कहां खड़ी है और साउथ कोरिया की शिक्षण व्यवस्था आज इतनी बेहतर क्यों है। जबकि दोनों ही देशों ने विभाजन का दंश भी झेला है।

कोरिया में पढ़ाई से ज्यादा प्रेक्टीकल पर जोर
दल के सदस्यों ने पांच दिवसीय प्रवास पर साउथ कोरिया के स्कूल, कॉलेज तथा विश्व विद्यालयों का भ्रमण किया। यही नहीं कई क्लासेस को भी अटैंड किया। इस दौरान उन्होंने भारत और दक्षिण कोरिया की शैक्षणिक व्यवस्था में जो खास फर्क देखा उसमें यहां किताबी पढ़ाई से ज्यादा प्रेक्टीकल पर ज्यादा जोर है। यही नहीं यहां शिक्षक मार्गदर्शक की भूमिका में है। जो बच्चों की नेचुरल सोच व रचनात्मकता को आगे बढ़ाने का काम करता है।

[MORE_ADVERTISE1]

मिडिल क्लास से दिया जाता है टेक्नोलॉजी का ज्ञान
साउथ कोरिया में प्राथमिक शिक्षा कक्षा 1 से 6, मिडिल 7 से 9 तथा हाई 10 से 12 तक मानी जाती है। खास बात यह है कि यहां मिडिल क्लास में ही बच्चों को टेक्नोलॉजी की जानकारी दी जाती है। जबकि यह शिक्षा भारत में उच्च शिक्षा की क्लासेस में दी जाती है। यही नहीं प्रारंभिक अवस्था से ही लीडरशिप क्वालिटी विकसित करने हाल ही में सामाजिक विज्ञान को सेलेबस में शामिल किया गया है। यही नहीं कोरिया में 8 बच्चों पर एक शिक्षक है तथा महिला शिक्षकों की संख्या ज्यादा है।

कोरिया में सबसे ज्यादा सैलरी शिक्षक की
दक्षिण कोरिया व भारत की शैक्षणिक व्यवस्था में सबसे बड़ा फर्क दल के सदस्यों ने जो देखा वह है कोरिया में शिक्षक की सैलरी सबसे ज्यादा है। यहीं नहीं सम्मान के मामले में भी सबसे ऊंचा कद शिक्षक का ही है। दूसरा सबसे बड़ा अंतर सफाई व्यवस्था में देखने को मिला। कोरिया के स्कूलों में साफ सफाई खुद बच्चे ही करते हैं। शिक्षक सिर्फ मदद करते हैं। दल में मौजूद म्याना हायर सेकेंडरी स्कूल के प्रिंसीपल हरिनारायण जाटव ने बताया कि वे जब कोरिया के सरकारी स्कूल में पहुंचे तो वहां मध्यान्ह भोजन के बाद बच्चे ही बर्तन साफ कर रहे थे। वहां बर्तनों को साफ करने जो मशीन लगी थी उसमें बर्तन डालने का काम बच्चे ही कर रहे थे।

समाज करता है शिक्षकों का मूल्यांकन
दक्षिण कोरिया में शिक्षण व्यवस्था भारत की तुलना में इतनी बेहतर क्यों हैं। इसकी मुख्य वजह दल के सदस्यों ने बताई कि यहां शिक्षकों को सबसे ज्यादा वेतन तो दिया ही जाता है लेकिन उनका मूल्यांकन भी समाज के ही लोग करते हैं। जिसके लिए बकायदा स्कूल के प्रत्येक कक्ष में अलग से बैठने की व्यवस्था है। जहां से यह लोग शिक्षक को पढ़ाते हुए देखते हैं और फिर उसका मूल्यांकन करते हैं। यही वजह है कि कोरिया में हर व्यक्ति पढ़ लिखकर शिक्षक ही बनना चाहता है।

[MORE_ADVERTISE2]