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बसपा का संगठनात्मक बदलाव कितना कारगर साबित होगा इन दो मंडलों की 42 सीटों पर

Dheerendra Vikramadittya

Publish: Nov 07, 2019 12:28 PM | Updated: Nov 07, 2019 12:28 PM

Gorakhpur

  • जिलेवार तीन-तीन प्रभारी तैनात कर विधानसभा चुनाव की शुरू की तैयारी
  • भाइचारा कमेटियों के भरोसे फिर वोटरों को साधेगी बसपा

गठबंधन की राजनीति फेल होने के बाद बहुजन समाज पार्टी अब पुरानी राह पर चल पड़ी है। बसपा में एक बार फिर सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले पर जोर देने के साथ भाईचारा कमेटियों के गठन पर निर्णय लिया गया है। जिला स्तर पर तीन-तीन प्रभारी तैनात किए गए हैं जो विभिन्न जातियों की कमेटियां बनाकर संगठन से जोड़ेंगी।

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सोशल इंजीनियरिंग के बल पर 2007 के चुनाव में लहराया परचम

दलित राजनीति से उभरी बहुजन समाज पार्टी ने 2007 में पूर्ण बहुमत से यूपी में सरकार बनाई थी। इस चुनाव में बसपा का सोशल इंजीनियरिंग फार्मूला हिट रहा था। विभिन्न जातियों को भाइचारा कमेटियों से साधने में सफल रही मायावती ने अल्पसंख्यक वोटरों को भी सपा से दूर कर दिया था। हालांकि, सत्ता में आने के बाद बसपा का सोशल इंजीनियरिंग फार्मूला कुंद पड़ता गया। 2012 का चुनाव आते आते बसपा से कई जातियां दूर होती गई। यही नहीं 2012 आते आते विभिन्न जातियों की राजनीतिक पार्टियां भी अस्तित्व में आने लगी। जाति आधारित पार्टियों की मजबूत होती पकड़ ने भी बसपा को नुकसान पहुंचाया। गोरखपुर-बस्ती मंडल में बसपा की स्थिति भी कमजोर हुई। यहां निषाद, पासी, राजभर, बिंद, मल्लाह, केवट सरीखी जातियों की अधिकता वाली सीटों पर जातिय क्षत्रप मजबूत होते गए। छोटे दलों की स्थिति मजबूत होती गई।

गठबंधन से अलग होने के बाद फिर सोशल इंजीनियरिंग पर जोर

सपा गठबंधन से अलग होने के बाद बहुजन समाज पार्टी ने एक बार फिर जातिय राजनीति पर फोकस कर दिया है। बसपा के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं कि भाइचारा कमेटियों को सक्रिय करने का आदेश पहले ही हो गया था। इन कमेटियों के माध्यम से विभिन्न वर्ग-समुदाय-जाति को जोड़ा जाएगा। संबंधित जाति के बीच उनकी जाति के नेताओं को भेजकर बसपा के पक्ष में रहने की अपील की जाएगी।

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2007 में गोरखपुर-बस्ती मंडल में जबर्दस्त प्रदर्शन

बसपा ने 2007 में सोशल इंजीनियरिंग के बल पर विधानसभा चुनाव में जोरदार प्रदर्शन किया था। गोरखपुर-बस्ती मंडल की 42 विधानसभा सीटों पर बसपा ने 15 सीटों पर जीत हासिल की थी। जबकि आधा दर्जन से अधिक सीटें मामूली वोटों से गंवाई थी। यह बसपा का इस मंडल का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन रहा। हालांकि, 2012 के विधानसभा चुनाव में यह स्थिति पार्टी बरकरार नहीं रख सकी। इस बार बसपा को अपनी जीती आधी सीटें गंवानी पड़ी थी। बसपा को महज आठ सीटें मिली। हालांकि, पहली बार कुशीनगर जिले में बसपा ने खाता खोला था। यहां की पडरौना सीट पर बसपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष व वर्तमान में भाजपा सरकार में मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने जीत दर्ज कराई थी।

2017 का चुनाव सबसे खराब रहा बसपा के लिए

लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। दोनों मंडलों की 42 सीटों में से सिर्फ एक सीट पर बहुजन समाज पार्टी ने जीत हासिल की। इस सीट पर पूर्व मंत्री हरिशंकर तिवारी के पुत्र विनय शंकर तिवारी ने बसपा के सिंबल पर जीत दर्ज की। हालांकि, चिल्लूपार सीट तिवारी परिवार की पारंपरिक सीट रही है। यहां पूर्व मंत्री ने छह बार जीत हासिल की थी। बस्ती मंडल में तो बसपा का सुपड़ा ही साफ हो गया।

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