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12 जुलाई से शयन में चले जाएंगे भगवान विष्णु, 8 नवंबर तक इन शुभ कार्यों पर लगेगा ब्रेक

Akanksha Agrawal

Publish: Jul 11, 2019 15:38 PM | Updated: Jul 11, 2019 15:38 PM

Gariaband

आषाढ़ शुक्ल एकादशी शुक्रवार 12 जुलाई से चातुर्मास व्रत शुरू हो रहा है। इसके साथ ही शादी विवाह समेत तमाम विशिष्ट यज्ञ अनुष्ठानों पर अगले 8 नवंबर तक ब्रेक लग जाएगा।

गरियाबंद. आषाढ़ शुक्ल एकादशी (Ashadh Shukla Ekadashi) शुक्रवार 12 जुलाई से चातुर्मास व्रत शुरू हो रहा है। इसके साथ ही शादी विवाह समेत तमाम विशिष्ट यज्ञ अनुष्ठानों पर अगले 8 नवंबर तक ब्रेक लग जाएगा। सनातन धर्म परंपरा में मान्यता है कि भगवान श्री हरिविष्णु आषाढ़ शुक्ल एकादशी में देवोत्थान एकादशी पर्यंत शयन में चले जाते हैं। इस 4 महीने की अवधि में कोई विशिष्ट यज्ञ अनुष्ठान विवाह उपनयन संस्कार आदि शुभ कार्य संपादित नहीं होते।

4 महीने तक चलने वाले चातुर्मास में सनातन धर्म के तपस्वी संत महात्मा आदि व्रत रखते हैं। ये संत एकांत में कहीं गंगा के तट पर कहीं दे स्थान में कहीं आश्रमों में और तीर्थ स्थानों में रहकर नियम संयम पूर्वक सनातन वैदिक धर्म की रक्षा के लिए तपस्या आदि करते हैं।

रुद्राभिषेक आदि के साथ जगह-जगह मठ मंदिरों में पूरे चतुर्मास के दौरान भजन कीर्तन व प्रवचन भी होता है।
चतुर्मास का अर्थ है चार महीना। यह व्रतचार महीने का होता है। आषाढ़ शुक्ल पक्ष एकादशी से कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी तक यह व्रत रहता है। इसे देव शयनी एकादशी से लेकर देवोत्थान एकादशी तक मनाया जाता है। पंडित संतोष शर्मा के अनुसार यह चार महीना भगवान विष्णु के शयन का महीना है। इन चार महीनों में कोई भी मांगलिक कार्य नहीं किया जाता है।

यह त्यौहार आषाढ़ शुक्ल पक्ष एकादशी से आरंभ होता है और इसके पांच दिनों बाद सावन महीना शुरू होता है। इसीलिए खानपान में कुछ नियम का पालन करना चाहिए। जैसे सावन में साग, भादो में दही, अश्विन में दूध और कातिक में दाल खाना मना है। इन चार महीनों में अनेक त्यौहार आते हैं जैसे गुरु पूर्णिमा श्रावणी पूर्णिमा कृष्ण जन्माष्टमी पितृपक्ष आदि। सभी पर्व को मनाते हुए यह चतुर्मास व्रत नियम के साथ संपन होता है। सनातन धर्म परंपरा में इन चार महीनों में किसी भी पवित्र नदी को लांघना मना है। जो चतुर्मास व्रत का संकल्प लेता है उसे उसी स्थान पर चार महीना ठहरना है। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है।

भगवान शिव व शक्ति की पूजन का विशेष महत्व
लक्ष्मी वेंकटेश मंदिर के पुजारी आचार्य पवन शास्त्री के अनुसार चातुर्मास व्रत 8 नवंबर को देवोत्थान एकादशी पर्यंत चलेगा। देवोत्थान एकादशी के दिन श्रीहरि का पुन: जागरण होगा। इसके बाद लगना आदि शुभ कार्य फिर से शुरू हो जाएंगे। इन चार महीनों में भगवान शिव एवं शक्ति की पूजन का विशेष महत्व है। जैसे सावन भादो में माता पार्वती भगवान शिव व गणेश आदि देवताओं की उपासना और अश्विन में माता दुर्गा की उपासना करने का विधान है।

शंकराचार्य आदि संत व मंडलेश्वर की परंपरा में आज भी चातुर्मास व्रत करने का विधान है। यह भी मान्यता है कि जो भी संत वर्षा ऋतु शुरू होने के पहले जहां ठहर गए, वहीं चार महीने बिताते हैं, यात्रा नही करते। चतुर्मास व्रत के दौरान आम सनातन धर्मावलंबियों को नियम-संयमपूर्वक आहार-व्यवहार एवं विचार रखना चाहिए। साथ ही श्री हरि प्रभु का स्मरण एवं ध्यान करना चाहिए इससे अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है।

 

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