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सूत मिल स्थापना को लेकर सांसद की पहल, इटावा के बुनकरों में जगी एक नई उम्मीद

Akansha Singh

Publish: Dec 03, 2019 12:29 PM | Updated: Dec 03, 2019 12:29 PM

Etawah

जिले में बुनकर उद्योग को बढ़ावा देने के लिए भाजपा सांसद डा. रामशंकर कठेरिया ने सूत मिल का मुद्दा लोकसभा में उठाया है।

 

दिनेश शाक्य
इटावा. जिले में बुनकर उद्योग को बढ़ावा देने के लिए भाजपा सांसद डा. रामशंकर कठेरिया ने सूत मिल का मुद्दा लोकसभा में उठाया है। उन्होंने सदन के माध्यम से केंद्र सरकार से इटावा जिले में नई जगह पर सूत मिल की स्थापना कराने की मांग की है। संसद में सवाल उठाते हुए कहा कि इटावा के बुनकर उद्योग का पूरे देश में नाम रहा है। यहां बनने वाले सूत के कपड़े की पहचान देश भर में होती थी। गरीबों को रोजगार भी मिल जाता था। उनका तर्क है कि पूर्ववर्ती सपा सरकार ने इटावा शहर में बंद पड़ी सूत मिल की 44 एकड़ जमीन को आवास विकास को 102 करोड़ रुपये में बेच दिया। अब आवास विकास यहां कालोनी विकसित कर रहा है। इटावा में रोजगार को कोई बड़ा कारखाना नहीं है। ऐसे में अब आवश्यक हो गया है कि इटावा में सूत मिल के लिए कोई नई जगह तलाशी जाए। वहां सूत मिल बने जिससे बुनकर उद्योग को बढ़ावा मिलेगा। गरीब बुनकरों को रोजगार का साधन मिलेगा।

2014 में सूत मिल ध्वस्त का हुआ निर्णय

साल 2014 मे अखिलेश सरकार ने इटावा की सूतमिल की जमीन पर आवास विकास कालौनी स्थापित करने का निर्णय ले लिया। इटावा सूतमिल, जो 1999 से बंद हो चुकी है कि जमीन को एक सौ दो करोड़ में आवास विकास परिषद बेच दिया गया। सूतमिल की जमीन पर कालोनियों का निर्माण करने का फैसला किया। उद्योग के नाम पर एक मात्र सूत मिल भी साल 1999 से बंद चल रही थी। सूत मिल की जमीन पर आवास विकास कालोनी का निर्माण कराये जाने की घोषणा के बाद यहां के बुनकर सन्न रह गये थे। मुख्यमंत्री चंद्रभान गुप्त ने 1967 में इटावा में सूत मिल स्थापित कराई थी। इटावा जिले की एक मात्र सूत मिल 1999 से बंद पडी थी लेकिन अचानक सूतमिल की जमीन पर आवास विकास कालौनी का निर्माण कराये जाने के ऐलान ने बुनकरो को बैचेन कर दिया है।

कोपरेटिव नीति रही खतरनाक

मिल के पुराने कर्मी रहे नरेश चैधरी बताते हैं कि तत्कालीन एमडी विजय शंकर पांडेय ने फेडरेशन की 11 मिलों को हाईटेक करने के लिए 267 करोड़ का लोन लिया था। मिल हाईटेक तो हुईं, नई मशीनें आईं लेकिन घाटा हो गया। बाद में मिल कर्ज में डूब गई। प्रदेश सरकार से मदद मांगी गई लेकिन कर्ज इतना हो गया कि सरकारों ने हाथ खींच लिया। बाद में कर्ज दाता फर्म ने सूत मिल पर मुकदमा किया। कोर्ट के आदेश पर वर्ष 2004 में मशीनों को औने पौने दामों में बेंच दिया गया। तब से अब तक किसी सरकार ने इसे फिर से चालू कराने का प्रयास नहीं किया। नरेश चैधरी बताते हैं कि वर्ष 2007 में मुलायम सिंह से मिलने गए यूनियन के सदस्य को उन्होंने मिल फिर से चालू कराने का आश्वासन दिया था। उसके बाद से उनकी सरकार नहीं रही।

कर्मियों का हुआ है शोषण

मिल में बतौर बाबू तैनात रहे एक पुराने कर्मचारी बद्रीप्रसाद बताते हैं मिल को हाईटेक करने के लिए इतनी बडी रकम ली गई कि मुनाफे से ज्यादा उसका ब्याज बढता गया। इसके बाद किन्हीं कारणों से मिल का उत्पादन भी अचानक कम हुआ। हालत ये हुए कि धीरे धीरे कर्मचारियों की छटनी शुरू हुई। सरकारों को इससे अवगत कराया जाता रहा लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। आखिर मिल खत्म हो गई। रही सही कसर बिचैलिया टाइप अफसरों ने मिल की मशीनों को औने पौने दाम में बिकवा दिया। 2004 में जब मशीनें बिकी थी तब पौने दो करोड़ दाम लगे थे लेकिन जब इन्हीं मशीनों को 6 साल बाद 2004 में कबाड़ की तरह बेचा गया तो आठ करोड़ की रकम मिली थी। यानी उस समय सही हालत में मशीनों की मामूली कीमत लगाई गई।

बुनकर उधोग हो गया है शून्य

इटावा जिले में अब बुनकरी का कारोबार लगभग खत्म हो गया। इटावा में सूत मिल की स्थापना ही बुनकरों को ध्यान में रखकर की गई थी। सूत मिल में बुनकरों को सस्ता सूत मिलता था। 1999 में सूत मिल बंद होने से करीब 50 हजार बुनकरों का कामकाज ठप हो गया। अब ये सारे बुनकर बदहाल हैं। बुनकरों की बदहाली का कारण एक सूत मिल का बंद होना रहा, जबकि इसकी खुद की समितियां भी इनकी बदहाली के लिए कम जिम्मेदार नहीं रही। 50 हजार से ज्यादा बुनकरों के बीच करीब 500 से ज्यादा तो समितियां बनीं। इन समितियों ने इसके विकास के लिए बनी योजनाओं को दीमक की तरह चट कर दिया। इसके अलावा बुनकरों ने बाहर से सूत मंगाकर बुनकरी शुरू की तो वह उनके बजट से बाहर हो गया। धीरे धीरे यहां की बुनकरी खत्म हो गई।

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