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पीढिय़ों का नाता, खिंच लाया गुजरात से डूंगरपुर

Milan Sharma

Publish: Aug 19, 2019 10:44 AM | Updated: Aug 19, 2019 10:44 AM

Dungarpur

स्वामी ब्रह्मानंद की समाधि स्थल की पूजा-अर्चना, शिवाश्रम आश्रम से पहुंचे सैकड़ों श्रद्धालु, सुरपुर माधवरायजी मंदिर में कीर्तन

डूंगरपुर. भक्ति का मार्ग ऐसा है कि वह भक्त को भगवान से मिला ही देता है। फिर मीलों की दूरिया भी मायने नहीं रखती हैं। गुजरात का वागड़ घनिष्ठ नाता रहा है। समय-समय पर वहां से भक्त डूंगरपुर में रहे साधु-संतों का पुण्य स्मरण करने आते रहते हैं। इसी श्रृंखला में रविवार को गुजरात के आंतरोली, कासौड़ी एवं सालैया वीरपुर क्षेत्र से सैकड़ों श्रद्धालु पहुंचे तथा यहां उन्होंने सुरपुर माधवरायजी मंदिर तथा यहां ब्रह्मानंद स्वामी के समाधिस्थल पर दिनभर पूजा-अर्चना की। इससे क्षेत्र का माहौल भक्तिमय बना। बड़ी संख्या में आए श्रद्धालुओं ने बताया कि वह वर्ष में एक बार यहां आते हैं तथा भजन-कीर्तन कर वापस लौट आते हैं।


सुबह से आए देर शाम लौटे
शिवाश्रम से आए जत्थे में शामिल परमेश भावसार, भरत पटेल, महेन्द्र पटेल एवं भानू पटेल ने बताया कि श्रावण सुद पूर्णिमा के पहले या बाद के रविवार को यहां हर वर्ष आते हैं। वह सुबह जल्दी यहां आए। यहां उनके गुरु शिवानंद स्वामी के गुरु स्वामी ब्रह्मानंद की समाधि स्थल सुरपुर माधवरायजी मंदिर के पास पहुंचे। यहां सामूहिक वंदना की। बाद में माधवरायजी मंदिर में संकीर्तन कर किया। भरत पटेल ने बताया कि श्रावण सुद पूर्णिमा के दिन ही ब्रह्मलीन हुए थे।


राज्यसभा सांसद पहुंचे
राज्यसभा सांसद हर्षवर्धनसिंह भी माधवराय मंदिर पहुंचे। यहां उन्होंने स्वागत-सत्कार करते हुए कहा कि वागड़ और गुजरात का नाता काफी घनिष्ठ है। वह यहां आते रहे और यथासंभव जो भी सहयोग वह दे सकेंगे वह देंगे। जत्थे के प्रतिनिधि दल ने ब्रह्मानंद स्वामी एवं शिवानंद स्वामी के डूंगरपुर से जुड़ाव की जानकारी भी बताई। इस दौरान मनमोहन भावसार ने श्रद्धालुओं का स्वागत किया। श्रद्धालुओं ने डूंगरपुर शहर के पर्यटन स्थलों का भी भ्रमण किया।


यह बताया इतिहास
जत्थे में शामिल भरत पटेल ने बताया कि शिवानंद महाराज हमारे गुरु थे। शिवानंद महाराज ब्रह्मानंदजी महाराज को अपना गुरु मानते थे। यहां सुरपुर में ब्रह्मानंदजी महाराज की समाधि है। ब्रह्मानंदजी महाराज की गादी महारावल स्कूल के सामने मंगलेश्वर महादेव मंदिर में है। शिवानंद महाराज बाद में गुजरात आए तथा यहां भक्ति एवं योग की अलख जगाई।