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ट्रांसप्लांट से आसन हो गया किडनी का इलाज, जानें इसके बारे में

Vikas Gupta

Publish: Oct 17, 2019 13:46 PM | Updated: Oct 17, 2019 13:46 PM

Disease and Conditions

आमतौर पर किडनी संबंधी रोगों के इलाज की शुरुआत में दवाओं व डायलिसिस की मदद लेते हैं। लेकिन इनसे राहत न मिलने पर इलाज के कई अन्य तरीके भी अपनाए जाते हैं।

आमतौर पर किडनी संबंधी रोगों के इलाज की शुरुआत में दवाओं व डायलिसिस की मदद लेते हैं। लेकिन इनसे राहत न मिलने पर इलाज के कई अन्य तरीके भी अपनाए जाते हैं।

किडनी ट्रांसप्लांट-
किडनी फेल होने के बाद गुर्दा प्रत्यारोपण ही आखिरी इलाज है। रोगी का परिजन (ब्लड रिलेशन) अपनी किडनी दान कर उसकी जान बचा सकता है। सीकेडी रोग के सभी रोगियों का समय रहते ही ट्रांसप्लांट होना जरूरी है। वर्ना कुछ समय बाद रोगी की जान बचा पाना मुश्किल होता है। आजकल ओपन, लेप्रोस्कोपिक और रोबोटिक किडनी ट्रांसप्लांट की सुविधा है।

दवाओं-डायलिसिस की मदद-
किडनी संबंधी किसी भी प्रकार के रोग के लिए आमतौर पर शुरुआती स्टेज में दवाओं के अलावा रोगी को खानपान में सुधार की सलाह देते हैं। इसके बावजूद यदि किडनी अपना काम पूर्ण रूप से नहीं कर पाती तो डायलिसिस करना पड़ता है।

अन्य ब्लड ग्रुप की किडनी -
समान ब्लड ग्रुप के डोनर के अभाव में एबीओ इंकॉम्पेटिबल किडनी ट्रांसप्लांट प्रक्रिया अपनाते हैं। इसके तहत प्लाज्मा में से रक्त के भीतर की एंटीबॉडीज को हटाते हैं ताकि उसका रक्त दूसरे ब्लड ग्रुप की किडनी को प्रत्यारोपण के बाद स्वीकार कर ले।

क्रॉस ट्रांसप्लांट : रोगी-डोनर का ब्लड ग्रुप जब मैच नहीं करता है तो एक कानूनी प्रक्रिया को पूरा करने के बाद रोगी की जान बचाने के लिए क्रॉस ट्रांसप्लांट किया जाता है।

कैडेवर ट्रांसप्लांट : इसमें ब्रेन डेड मरीज की दोनों किडनियों को दो मरीजों को लगाकर उन्हें नया जीवन देने का काम हो रहा है। इसे लेकर देशभर में जागरुकता की जरूरत है।

हेपेटाइटिस-सी से संक्रमित गुर्दा भी उपयोगी -
जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने दाता के अभाव में लंबे समय से किडनी ट्रांसप्लांट का इंतजार कर रहे मरीजों के लिए उम्मीद की किरण जगाई है। उन्होंने हेपेटाइटिस-सी से संक्रमित किडनी रोगी के इलाज का तरीका निकाला व उनकी किडनी को प्रत्यारोपण के जरूरतमंद मरीजों के लिए उपयोगी बनाने का प्रयास किया। 10 हेपेटाइटिस-सी से संक्रमित किडनी रोगी को शोध के दौरान एंटीवायरल दवा दी गई ताकि संक्रमण शरीर में न फैले। ये दवाएं ट्रांसप्लांट के बाद भी 12 हफ्तों तक जारी रहीं। कुछ समय बाद संक्रमण का असर कम पाया गया।