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‘अपनी आत्मा में ही रमण करना उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म’

mahesh gupta

Publish: Sep 12, 2019 19:12 PM | Updated: Sep 12, 2019 19:12 PM

Dholpur

दिगंबर जैन समाज के दशलक्षण पर्यूषण पर्व के अंतिम दिन गुरुवार को उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की पूजा उपासना की गई। पर्व के अंतिम दिन धर्मावलंबियों ने श्रद्धापूर्वक व्रत रखे। मंदिरों में जाकर विशेष पूजा अर्चना की।

धौलपुर. दिगंबर जैन समाज के दशलक्षण पर्यूषण पर्व के अंतिम दिन गुरुवार को उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की पूजा उपासना की गई। पर्व के अंतिम दिन धर्मावलंबियों ने श्रद्धापूर्वक व्रत रखे। मंदिरों में जाकर विशेष पूजा अर्चना की। सम्यक से आत्मा को पर से रहित पहचानना, आत्मा में रमण करना, बस उसे अपना मानना, निज आत्मा में रमण बस धर्म की श्रेष्ठता है। ब्रह्मा अर्थात सच्चिदानंद आत्म में लीन होना ब्रह्मचर्य धर्म है। ब्रह्मचर्य व्रत का पालन संयम के शिखर पर कलसा रोहण की तरह है। ब्रह्मचर्य उपादेय है। इससे आत्मा में भव्यता और भावों में निर्मलता आती है। पुरुषार्थी संयम व सील का पालन करते हैं, वे पुण्य आत्मा हैं। आत्मा अंतर में झांकने पर ही दिखाई देती है। सभी साधना में ब्रह्मचर्य को सबसे प्रमुख स्थान है। उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। आत्मा की उपलब्धि के लिए किया जाने वाला आचरण ही ब्रह्मचर्य है। साधक दुनिया के मायाजाल से हटकर अपने आत्म तत्व में लीन होकर ब्रह्मचर्य की साधना करता है। प्रवक्ता धनेश जैन ने बताया कि संयम और आत्म शुद्धि के महापर्व के बाद शनिवार को क्षमावाणी महापर्व मनाया जाएगा। क्षमावाणी पर्व पर समाज बंधु एक दूसरे से क्षमा याचना करेंगे अर्थात पूरे वर्ष में मन वचन काय से हमसे जो भूल हुई हो, उसके लिए हम क्षमा प्रार्थी है। पर्यूषण पर्व का महत्व ही क्षमा याचना है।