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मन ही बंधन और मोक्ष का कारण - धर्मेन्द्रदास

Rajendra Kumar Jain

Publish: Nov 18, 2019 11:58 AM | Updated: Nov 18, 2019 11:58 AM

Dausa

- तीन दिवसीस सत्संग समारोह का समापन

 

 

दौसा. संत कबीर आश्रव सेवा समिति के तत्वावधान में तीन दिवसीस सत्संग समारोह का समापन रविवार को हुआ। इसमें कबीर पारख संस्थान इलाहबाद के आचार्य धर्मेन्द्रदास ने कहा कि मनुष्य से बड़ा इस संसार में कोई दूसरा प्राणी नहीं है। मन ही बंधन और मोक्ष का कारण है। इसलिए मन, वाणी और कर्मों की पवित्रता ही सबसे बड़ी साधना है। स्वर्ग और नरक व्यक्ति इसी जीवन में मिलता है। समिति अध्यक्ष साधु महेन्द्रदास ने कहा कि ईश्वर,खुदा ही व्यक्ति के भीतर ही विद्यमान है। इस बाहर खोजना ही मनुष्य की सबसे बड़ी भूल है। अपने भीतर चेतनरूपी हीरा ही मूल्यवान है। मनुष्य को अपने कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है। संत रामेश्वर, कर्मचंद, चूड़ामणी, सत्येप्द्र, मुनीन्द्र, अमरेन्द्र, गुणेन्द्र, सुधीर (लालसोट) आदि ने भी विचार व्यक्त किए। सत्संग समारोह में दौसा सहित अन्य स्थानों के श्रद्धालुओं की भी भीड़ उमड़ी।


बुराई छोडऩे अच्छाई ग्रहण करने का लिया संकल्प
महायज्ञ की पूर्णाहुति
भांडारेज. कस्बे के मेला मैदान में गत दिनों से चल रहे गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति रविवार को हुई।हजारों श्रद्धालुओं ने पंगत लगाकर प्रसादी पाई।श्रद्धालुओं ने बड़ी उमंग के साथ भागीदारी निभाते हुए पूर्णाहुति में एक बुराई छोडऩे एवं एक अच्छाई ग्रहण करने का संकल्प लिया। शांतिकुंज हरिद्वार के आचार्य जसवीर ने यज्ञ को ज्ञान और विज्ञान का पर्यायवाची बताया। उन्होंने कहा कि यज्ञ श्रम एक विज्ञान है, इसमें मंत्र चेतना का समन्वय व्यक्ति को एक आध्यात्मिक शिखर पर पहुंचाता है। यज्ञ में गायत्री परिवार के रमेशचंद्र लाटा, ओमप्रकाश शर्मा रूपनारायण मामोडिया, मोहनलाल सोनी, सुशील गुप्ता, वैद्य मोहनलाल, कमल पटेल, रामनारायण शर्मा, सुनील खुंटेटा गुरुदयाल शास्त्री, कृष्णा पटेल, बनवारी शर्मा, चिरंजीलाल शर्मा, रामजीलाल गुप्ता, श्रवण शर्मा, जगदीश अग्रवाल आदि ने भागीदारी निभाई। यज्ञ में हजारों लोगों ने आहुतियां समर्पित की।


सभी की सुख की कामना करें
लालसोट. पावन वर्षायोग समिति के तत्वावधान में रविवार को जैन नसियां परिसर में हुई धर्मसभा में जैनाचार्य संत विवेक सागर ने कहा जीवन का कोई भरोसा नहीं है किसी भी क्षण कुछ भी हो सकता है। जबकि व्यक्ति अपनी आकांक्षाओं को बढ़ाने में लगा हुआ है। जीवन की लीला पानी की बूंद की तरह है। कब मिट जाए कोई ठिकाना नहीं है। कुछ दिनों का जीवन मिला है, उसमें भी सुख कम है। गम की घटा ज्यादा नजर आती है। इसलिए धर्म के बिना मानव जीवन शोभा नहीं दे पाता है। उन्होंने कहा कि प्रवास में विद्या मित्र है, घर में पत्नी मित्र है, रोग होने पर औषधि मित्र है, लेकिन धर्म जन्म से मृत्यु पर्यन्त तक मित्र रहता है। धर्म से ही पापों से मुक्ति मिलती है।

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