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पुरानी परंपरा के अनुसार अंचल में होता है सेरो का आयोजन

Samved Jain

Publish: Aug 17, 2019 18:31 PM | Updated: Aug 17, 2019 18:31 PM

Damoh

आज भी पुरानी परंपरा के अनुसार अंचल में होता है सेरो का आयोजन

दमोह/खडेरी. जिले के ग्रामीण अंचल में अभी भी वर्षों पुरानी पंरपरा अनुसार रक्षाबंधन के दूसरे दिन कंजलियों के पर्व पर सेरो नृत्य का आयोजन किया जाता है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए बटियागढ़ तहसील क्षेत्र के ग्राम आलमपुर, खड़ेरी में ग्रामीणों द्वारा सेरो नृत्य का आयोजन किया गया। विदित हो कि यह नृत्य इस इलाके की पहचान बताई जाती है जो आज भी कायम है।

ऐसा सेरो नृत्य
इस नृत्य को करने वालों की एक टोली होती है। जिसमें करीब एक दर्जन नृत्य कला प्रवीण कलाकार शामिल रहते हैं। इन कलाकारों द्वारा नगडिय़ा, ढोलक की थाप, मजीरा की धुन पर गायन करके पैरों को थिरकाया जाता है। कलाकारों के दोनों हाथों में एक-एक लाठी जिसे डांडी कहते है वह होती है। कलाकर जब नृत्य करते हैं तो यह डांडी को घुमाते हैं और डांडियों को आपस में टकराकर एक धुन बनाते हैं। सभी कलाकार एक गोले में नृत्य के दौरान रहते हैं।

सार्वजनिक स्थल पर करते हैं नृत्य
सेरो नृत्य का आयोजन गांव के उस सार्वजनिक स्थल पर रखा जाता है जहां नृत्य के लिए पर्याप्त जगह हो। शुक्रवार को यह नृत्य खड़ेरी के मुख्य बाजार प्रांगण में आयोजित हुआ था। जिसमें एक दर्जन से अधिक कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति दी। यहां एक और बात प्रमुख है कि इस नृत्य में कोई भी हिस्सेदारी कर सकता है सिर्फ सेरो नृत्य का ज्ञान होना चाहिए। नृत्य का आयोजन करीब चार से पांच घंटे तक निरंतर चलता है। इस नृत्य को देखने के लिए आसपास के लोग भी पहुंचते हैं।