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ऐसा क्या हो रहा जिससे कूड़े में जा रही करोड़ों की दवाएं

Nilesh Kumar Kathed

Publish: Sep 11, 2019 23:42 PM | Updated: Sep 11, 2019 23:42 PM

Chittorgarh

जिंदगी बचाने के लिए पहले महंगी दवाएं खरीदी जाती है। स्वस्थ होने के बाद कई दवाएं बची रह जाती है। खुलने के बाद बची हुई दवाएं लेने से केमिस्ट इंकार कर देते है। ऐसे में महंगी दवाओं को भी कूड के ढेर में डालनेे के सिवाए कोई विकल्प नहीं बचता।



चित्तौडग़ढ़. जिंदगी बचाने के लिए पहले महंगी दवाएं खरीदी जाती है। स्वस्थ होने के बाद कई दवाएं बची रह जाती है। खुलने के बाद बची हुई दवाएं लेने से केमिस्ट इंकार कर देते है। ऐसे में महंगी दवाओं को भी कूड के ढेर में डालनेे के सिवाए कोई विकल्प नहीं बचता। हालांकि दवा बैंक होने पर यही बची हुई दवाएं किसी अन्य रोगी की जिंदगी बचाने में काम आ सकती। विशेष रूप से उन रोगियों की जिंदगी बचा सकती जिनकी आर्थिक स्थिति महंगी दवाओं को खरीदने में सक्षम नहीं है। चित्तौडग़ढ़ में जिला चिकित्सालय या अन्य चिकित्सलयों में दवा बैंक संचालित नहीं है। चिकित्सलय प्रशासन या मेडिकल क्षेत्र में सक्रिय किसी सामाजिक संगठन की ओर से भी ऐसा नहीं किया जा रहा है। दवा बैंक के अभाव में माना जा रहा है कि हर वर्ष केवल चित्तौडग़ढ़ शहर में ही करोड़ो रुपए की दवाएं सेहत सुधार के बाद कूड में चली जाती है। कई बार बची हुई दवा को रोगी व उसके परिजन किसी अन्य को देना चाहते है लेकिन वे कहां दे ये समझ नहीं पाते है।
बची हुई दवाएं कर सकती जीवन की रक्षा
ह्दय, किडनी, मधुमेह जैसे रोगों में रोगियों की जीवनरक्षा के लिए कई बार महंगी दवाएं लिखी जाती है। ये गोलियां व सीरप कई बार स्वस्थ होने के बाद बची रह जाती है। कई बार दवा बैंक के अभाव में रोगी ऐसी दवाएं कूडे ढेर में डालने या नाली में फेंकने के लिए विवश हो जाते है। दूसरी तरफ, कई जरूरतमंद रोगी आर्थिक स्थिति कमजोर होने से ऐसी दवाएं पाने के लिए सहायता को हाथ फैलाते है।
क्या है दवा बैंक की परिकल्पना
चिकित्सक कई बार जो दवाएं लिखते है उनकी एक्सपायरी अवधि एक-दो वर्ष आगे तक की भी होती है। बची हुई दवाएं किसी की जीवनरक्षा में काम आए इसीलिए दवा बैंक की परिकल्पना की गई। राज्य में विभिन्न चिकित्सालयों में ऐसे दवा बैंक संचालित है। इनमें उपचार के बाद बची हुई दवाएं अवधिपार नहीं होने पर जमा कराई जा सकती है तो जरूरतमंद रोगी यहां विधिवत प्रक्रिया के अनुसार ऐसी दवाएं नि:शुल्क प्राप्त कर सकता है। ऐसे दवा बैंकों का संचालन सरकारी तंत्र ही करें ये जरूरी नहीं कोई भी स्वयंसेवी या सामाजिक संगठन चिकित्सालय प्रशासन की अनुमति लेकर कर सकता है।

जिला चिकित्सालय में दवा बैंक नहीं
अभी चित्तौडग़ढ़ जिला चिकित्सालय में दवा बैंक नहीं है लेकिन प्रयास रहेगा कि ये जल्द शुरू हो जाए। इससे जरूरतमंद रोगियों को बची हुई अन्य रोगियों की दवाओं का लाभ भी मिल सकेगा।
डॉ. दिनेश वैष्णव, प्रमुख चिकित्साधिकारी, चित्तौडग़ढ़ जिला चिकित्सालय