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गोवर्धन पर्व पर अनूठी परम्परा: गायों को भड़का कर जाना क्या होगा अगले साल

abdul bari

Publish: Oct 28, 2019 18:45 PM | Updated: Oct 28, 2019 18:45 PM

Chittorgarh

गोवर्धन पूजा पर्व ( goverdhan pooja ) पर गायों को भड़काने की अनूठी परंपरा है इसके आधार पर आने वाले साल के जमाने का अनुमान लगाया जाता है। ( chittorgarh news ) अकोला कस्बे को दो भागों में विभक्त करने वाली बेड़च नदी के तट पर आयोजित हुआ कार्यक्रम

 

चित्तौड़गढ़
आकोला में गोवर्धन पूजा पर्व ( goverdhan pooja ) पर गायों को भड़काने की अनूठी परंपरा है इसके आधार पर आने वाले साल के जमाने का अनुमान लगाया जाता है। नए साल का अनुमान लगाने वाली अनूठी परंपरा के अनुसार सोमवार को आकोला में आयोजित खेख़रा पर्व पर यह भविष्यवाणी रही कि आने वाला साल न ज्यादा अच्छा और न ही ज्यादा खराब रहेगा।

इस तरह मनाई जाती है परंपरा ( chittorgarh news )

अकोला कस्बे को दो भागों में विभक्त करने वाली बेड़च नदी के तट पर आयोजित कार्यक्रम में अखाड़ा महन्त निर्मलदास महाराज, पूर्व प्रधान भगवती लाल हिंगड़, सरपंच अनिल सहलोत, पंचायत समिति सदस्य प्रभुलाल माली, पंचायत समिति सदस्य मुकेश रेगर सहित ग्राम आकोला के सभी समाज के पंच पटेलों की उपस्थिति में आयोजित खेख़रा पर्व पर इस बार नीले रंग की गाय सबसे पहले भड़की। इससे पंच पटेलों ने ये अनुमान लगाया गया कि आने वाला साल न ज्यादा अच्छा और नहीं ज्यादा खराब रहेगा। यहां पर सफेद रंग की गाय के पहले भड़कने पर सुकाल, काले रंग की गाय के भड़कने पर अकाल तथा नीले रंग की गाय के भड़कने पर आने वाले साल न ज्यादा बढ़िया और ना ही ज्यादा खराब रहने का अनुमान लगाया जाता है।

सजी धजी एवम घुंगरू बांध कर आती है गायें

पशुपालक अपनी गायों को अपने घरों में नहला कर विभिन्न तरह के रंगों की छापों से सजा धजा कर उनके गले में व पैरों में घुंगरू बांध कर खेख़रा स्थल पर लाते है।

ऐसे निभाई जाती है परम्परा

कस्बे के बेड़च नदी के किनारे निर्धारित स्थान पर गांव के प्रमुख पंच पटेलों की उपस्थिति में ग्रामीण अपनी गायों को सजा धजा कर लाते हैं। यहां पूजा अर्चना के बाद प्रतीकात्मक रूप से एक गाय की पूजा की जाती है। इसके बाद ग्वाला खेख़रा भड़काने के लिए बांस पर बनी हुई चमड़ी की कुप्पी व गेड़ी को हाथ में लेकर गायों के सामने कुप्पी को करता है। सबसे पहले भड़कने वाली गाय को ग्वाला दौड़ता हुआ गाय मालिक के घर तक ले जाता है। वहां रीति-रिवाज व परम्परा के अनुसार ग्वाले को भेंट स्वरूप राशि, धान व साफा बंधवा कर विदा किया जाता है।


गेड़ी भी बरसों पुरानी

खेख़रा पर्व पर गाय को भड़काने वाले ग्वाले ने बताया कि सैकड़ों वर्षों पुरानी उक्त परंपरा में जिस गेड़ी से गाय को भड़काया जाता है वह करीब 104 वर्ष पुरानी है तथा उसका नाम भानानाथ गेड़ी है।

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