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आखिर कैसे खुली सरकारी नींद, क्यों खंगाल रहे कॉलेज के बहीखाते

Nilesh Kumar Kathed

Publish: Aug 23, 2019 23:57 PM | Updated: Aug 23, 2019 23:57 PM

Chittorgarh


चित्तौडग़ढ़ पीजी कॉलेज में 89 लाख के गबन का मामला
ऑडिट के लिए आई कॉलेज शिक्षा आयुक्तालय से टीम
कॉलेज प्रशासन ने पुलिस में दर्ज करा रखी रिपोर्ट

चित्तौडग़ढ़. पांच वर्ष तक कॉलेज में छात्रकोष में जमा हो रही राशि में गड़बड़ी होती रहने व गबन का दायरा ८९ लाख रुपए से अधिक तक पहुंचने के बाद २१ जून को पुलिस में रिपोर्ट तो हो गई लेकिन कार्रवाई ठण्डे बस्ते में चली गई। गबन राशि की फाइलों की ऑडिट हुए बिना दो माह में भी पुलिस जांच आगे नहीं बढ़ पाने से अब जाकर सरकारी तंत्र की नींद खुली है। सूत्रों के अनुसार कॉलेज शिक्षा आयुक्तालय ने आया दल दो दिन से कॉलेज के लेखों की ऑडिट में लगा है। हॉलाकि ये जानकारी नहीं मिल पाई है कि ऑडिट में क्या सामने आ रहा है। माना जा रहा है कि ऑडिट दल द्वारा कॉलेज शिक्षा आयुक्तालय को पेश की जाने वाली रिपोर्ट के बाद ही मामले में आगे कार्रवाई होगी एवं उसी रिपोर्ट के आधार पर मामले की जांच में लगी सदर थाना पुलिस अगला कदम उठाएगी।
जिले के इस सबसे बड़े महाराणा प्रताप राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय चित्तौडग़ढ़ के प्राचार्य डॉ. राकेश भट्टड़ ने गबन के इस मामले में २१ जून को सदर थाने में निलंबित चल रहे कैशियर विक्रमसिंह के खिलाफ ८८ लाख ८९ हजार ९०५ रुपए गबन की नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई थी रिपोर्ट में इस मामले में किसी अन्य को नामजद तो नहीं किया गया लेकिन येे कहा गया है कि विक्रम सिंह व अन्य दोषी अधिकारी/कर्मचारी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सरकारी कोष की ८८ लाख ८९ हजार ९०५ रुपए की वसूली की जाए। माना जा रहा है कि कॉलेज शिक्षा आयुक्तालय का ऑडिट दल कॉलेज के लेखाजोखा खंगाल ये तय करने का प्रयास कर रहा है कि गबन के इस मामले में विक्रमसिंह के अलावा अन्य कौनसे अधिकारियों व कर्मचारियों की भूमिका रही। दल की रिपोर्ट से ही तय होगा कि गबन राशि ८९ लाख रुपए ही है या उसका दायर बढ़़ सकता। पुलिस में दर्ज रिपोर्ट के अनुसार प्रथम दृष्टया ८८ लाख ९४ हजार ९०५ रुपए का गबन प्रमाणित होने पर महाविद्यालय प्रशासन ने कॉलेज शिक्षा आयुक्तालय को पत्र भेज अंकेक्षण विभाग से ऑडिट कराने का आग्रह किया था। इस ऑडिट के बाद ही गबन की वास्तविक राशि का खुलासा हो सकेगा। इस मामले में कॉलेज शिक्षा आयुक्तालय ने २१ मई व १० जून को पत्र भेज प्राचार्य को विक्रम सिंह के अलावा गबन अवधि में रहे प्राचार्य, कार्यवाहक प्राचार्य, डीडीओ व सहायक लेखाधिकारी के खिलाफ भी एफआईआर के निर्देश दिए थे लेकिन प्राचार्य ने रिपोर्ट में इनमें से किसी को नामजद नहीं किया।
बैंक से पैसे निकाले लेकिन रिकॉर्ड ही नहीं
पुलिस में दी रिपोर्ट के अनुसार महाविद्यालय के बैंक खाते में एक अप्रेल २०१३ से ३१ मार्च २०१८ के मध्य दो करोड़ ५१ लाख १९ हजार ५७० रुपए की राशि विधिक स्रोत्रों से प्राप्त हुई। इस बैंक खाते से एक करोड़ ५३ लाख ४२ हजार १९४ रुपए का बैंक द्वारा तृतीय पक्षकार को भुगतान किया गया। महाविद्यालय के विभिन्न मदों में खर्च बाबत खाते से एक लाख २४ हजार ५६० रुपए का नगद आहरण समुचित लेखा नियमों से कैशियर विक्रम सिंह ने किया। रिपोर्ट में बताया गया कि ८८ लाख ९४ हजार ९०५ रुपए की राशि विक्रमसिंह द्वारा अलग-अलग तिथियों में जरिये चेक व नगद बैंक से आहरित की गई लेकिन इस राशि के सम्बन्ध में किसी भी प्रकार के वाउचर एवं दस्तावेज महाविद्यालय के लेखा एवं रोकड़ विभाग में उपलब्ध नहीं है। इस अवधि की रोकड़ बही का संधारण भी विक्रमसिंह द्वारा नहीं किया गया।
कैसे हुआ गबन का खुलासा
गत वर्ष जनवरी में कॉलेज में जनसहभागिता से नए कक्षाकक्ष बनाने की घोषणा की गई। इस कार्य के लिए तत्कालीन प्राचार्य आरएम कोचिटा ने २५ लाख रुपए की राशि का चेक बैंक में जमा कराने को दिया तो वहां से बैलेंस कम बताया गया। कॉलेज की कैश बुक इससे अधिक राशि जमा होना बता रही थी तो प्राचार्य को छात्र कोष की राशि में गबन की आशंका हुई। प्रारम्भिक पड़ताल के बाद कॉलेज शिक्षा आयुक्तालय को मामले की रिपोर्ट भेज दी गई। इसके बाद पता चला कि पांच वर्ष तक लेखाजोखा में गड़बड़ी है।
एसीबी की भी मामले पर नजर
कॉलेज में गबन के इस मामले में छात्रसंघ अध्यक्ष पहलवान सालवी की शिकायत के भ्रष्टाचार
निरोधक ब्यूरो ने भी उच्च शिक्षा विभाग के शासन सचिव से मामले में तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी थी। माना जा रहा है कि राजकीय राशि गबन के इस बड़े मामले
पर एसीबी भी निगाह रखे हुए है।
पत्रिका निरन्तर उठाता रहा गबन का मुद्दा
जांच रिपोर्ट में ८८ लाख से अधिक की राशि की गबन की पुष्टि हो जाने के पांच माह बाद तक भी कॉलेज प्रशासन गबन की रिपोर्ट दर्ज नहीं करा पाया। इस मामले को पत्रिका ने सबसे पहले ४ जून को जीम गए छात्रों का पैसा आरोपियों को सजा तो दूर जांच के लिए भी बहानेबाजी शीर्षक से समाचार प्रकाशित कर उठाया। इसके बाद पत्रिका ने नियमित अन्तराल में इस मामले में जुड़े विभिन्न पहलूओं व खामियों को पुरजोर तरीके से पाठकों के सामने रखा। इसके बाद कार्रवाई का दबाव बढ़ा व प्राचार्य को आखिर रिपोर्ट दर्ज करानी ही पड़ी।