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Business Women's day: मेहनत और ईमानदारी से बन गई साधारण से असाधारण महिला, पढ़ें पूरी खबर

Ashish Kumar Mishra

Publish: Sep 22, 2019 12:38 PM | Updated: Sep 22, 2019 12:38 PM

Chhindwara

आज बिजनेस वुमंस डे है।

छिंदवाड़ा. बेटियां आज किसी से पीछे नहीं हैं। हर फील्ड में अपना लोहा मनवाने के साथ उन्होंने बिजनेस में भी अच्छी पकड़ बनाई है। शुरुआत में संघर्ष करना पड़ा। लोगों ने मजाक भी उड़ाया, लेकिन आज उनकी अच्छी पोजिशन देखकर समाज उन्हें आइडल मान चुका है। शहर में ऐसी एक या दो बेटियां नहीं बल्कि कई चेहरे हैं, जिन्होंने रिश्क लिया, इन्वेस्ट किया और आज अच्छे मुकाम पर हैं। आज बिजनेस वुमंस डे है। हम आपको शहर के कुछ ऐसे ही चेहरे से परिचित करा रहे हैं।


परिवार का सपोर्ट मिला तो सपना हुआ साकार
विद्या भूमि पब्लिक स्कूल की प्रशासिका विजया यादव आज एक सफल महिला हैं, लेकिन उन्हें यह सफलता एक दो दिन में नहीं बल्कि कड़े संघर्ष के बाद मिली है। वर्ष 1992 में साधारण परिवार में उनकी शादी हुई। विजया बताती हैं कि शादी के कुछ समय तक उन्होंने एक हाउस वाइफ रहना ही उचित समझा, लेकिन फिर मन में आया कि पैरेंट्स ने पढ़ाया है तो उसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इस बारे में पति शेषराव यादव से राय ली। उन्होंने मुझे आगे बढऩे के लिए प्रेरित किया। पति पावर लिफ्टिंग में नेशनल प्लेयर रहे हैं। उनसे प्रेरणा लेकर मैंने एरोबिक्स, योगा सीखकर महिला हेल्थ क्लब खोला। कुछ ही समय में हेल्थ क्लब से काफी महिलाएं जुड़ गई। लगभग आठ साल तक मैंने हेल्थ क्लब चलाया। इसी दौरान स्कूल में अपने बच्चों की पढ़ाई देखकर मैं संतुष्ट नहीं हो रही थी। फिर मैंने स्कूल खोलने का मन बनाया। विजया यादव कहती हैं कि आज हम जो कुछ भी हैं उसमें सबसे बड़ा योगदान कड़ी मेहनत और ईमानदारी और परिवार का भरपूर साथ है।


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तिनका-तिनका जोडकऱ बनाया स्कूल
फस्र्ट स्टेप स्कूल की डायरेक्टर मंजू साव भी उन महिलाओं में शामिल हैं जिन्होंने कड़े संघर्ष से मुकाम हासिल किया है। उन्होंने बताया कि वह शुरु में भोपाल में एक शिक्षक के तौर पर पढ़ाती थी। वर्ष 1989 में पति के साथ छिंदवाड़ा आ गई। उस समय स्कूल खोलने का कोई विचार नहीं था। हां यह जरूर था कि जीवन में कुछ अलग और अच्छा करना है। हमारे पास कोई बैंक बैलेंस नहीं था। शुरुआत में मैं छिंदवाड़ा में कुछ जरूरतमंद लोगों को अंग्रेजी पढ़ाती थी। इसी दौरान किसी ने मुझे स्कूल खोलने का सुझाव दिया। नरसिंहपुर रोड पर किराए का मकान लेकर नर्सरी स्कूल खोला। हर एक कदम पर संघर्ष था, लेकिन हर जगह मैं डटकर खड़ी रही। आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के बावजूद भी मैंने हार नहीं मानी और तिनका-तिनका जोडकऱ, मेहनत कर आज यह मुकाम हासिल किया।


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जुनून और ईमानदारी से पाया मुकाम
एनी इंजीनियरिंग कॉलेज की डायरेक्टर नाजिया अली भी आज सफल महिला में शामिल हैं। उन्होंने बताया कि मेरी पढ़ाई के समय में ही माता-पिता की डेथ हो गई। मैं तीन भाई ओर दो बहनों में सबसे बड़ी थी। परिवार की पूरी जिम्मेदारी मेरे कंधे पर आ गई। मेरा सपना था कि मैं डॉक्टर या वकील बनूं, लेकिन पैरेंट्स की डेथ के बाद संघर्ष शुरु हुई। मैंने हर मुश्किल का सामना किया। मन में बस इतना था कि हम जो भी काम करें उससे किसी और की भी मदद हो। डॉक्टर और वकील बनकर भी मैं ऐसा ही करती। इसके बाद मैंने मध्यप्रदेश के कई जिलों में एक सोशल वर्कर के तौर पर काम किया। जो बच्चे पारिवारिक कारण से पढ़ नहीं पा रहे थे उनकी मदद की। एक दिन विचार में आया कि बच्चे 12वीं तक तो पढ़ लेते हैं, लेकिन इसके बाद दिक्कत होती है। छिंदवाड़ा एवं आसपास के जिलों में एक भी इंजीनियरिंग कॉलेज नहीं था। फिर मैंने यहां वर्ष 2012-13 में इंजीनियरिंग कॉलेज खोल लिया। इन सबके लिए परिवार ने भी मुझे पूरा सपोर्ट किया।


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चुनौतियों का किया डटकर सामना
सोनी कॉलेज की डायरेक्टर कीर्ति सोनी की सफलता काफी संघर्ष के बाद मिली है। उन्होंने बताया कि वर्ष 1999 में शादी के बाद संघर्ष शुरु हुआ। जिम्मेदारियां काफी बढ़ गई थी। घर को भी देखना था और आर्थिक स्थिति भी सुधारनी थी। शुरु में काफी परेशानी उठानी पड़ी, लेकिन मैंने हर चुनौती का डटकर सामना किया। घर को भी देखती और पति के व्यवसाय भी हाथ बंटाती थी। समय गुजरता गया और हमारी मेहनत बढ़ती गई। मेरे संघर्ष में परिवार का भी भरपूर सपोर्ट मिला। आज परिणाम सबके सामने है।