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सीनियर इंस्पेक्टर ने बताया कि पुलिस कैसे पकड़ती है सायबर क्रिमिनल्स को... जानिए यह राज क्या है

Jayant Kumar Singh

Publish: Oct 20, 2019 18:40 PM | Updated: Oct 20, 2019 18:40 PM

Bilaspur

जब सीनियर इंस्पेक्टर बोले इस क्राइम के लिए बड़े सेटअप की जरूरत नहीं, सब रह गए दंग
सीयू के फोरेंसिक साइंस विभाग में पांच दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला में व्याख्यान आयोजित

बिलासपुर। गुरु घासीदास विश्वविद्यालय (केन्द्रीय विश्वविद्यालय) की जीव विज्ञान अध्ययनशाला के अंतर्गत फारेंसिक साइंस विभाग में छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (सीजीकॉस्ट), रायपुर द्वारा प्रायोजित पांच दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन 15 से 19 अक्टूबर तक किया गया। इस पांच दिवसीय राष्ट्रीय कौशल विकास कार्यशाला का विषय ''एक्सप्लोरेशन ऑफ इम्पॉरटेंस ऑफ फोरेंसिक टेक्नीक्स बाय हेंड्स ऑन ट्रेनिंग टू दि बेनिफिट्स ऑफ सोसायटी'' है। यह कार्यशाला विश्वविद्यालय के कौशल विकास प्रकोष्ठ एवं फोरेंसिक साइंस विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हो रही है।
कार्यशाला के चौथे दिन प्रथम व्याख्यान में प्रभाकर तिवारी, सीनियर इंस्पेक्टर, साइबर क्राइम सेल, बिलासपुर (छ.ग.) ने साइबर क्राइम एंड इट्स डिटेक्शन पर व्यख्यान दिया। प्रभाकर तिवारी ने साइबर क्राइम को परिभाषित करते हुए बताया कि इस तरह के क्राइम को करने के लिए बहुत बड़े सेटअप की जरुरत नहीं बल्कि केवल मोबाइल एवं किसी भी स्थान से इन्टरनेट की सहायता से इस तरह के अपराध को अंजाम दिया जा सकता है। उन्होंने मोबाइल फोन के नेटवर्क ऑपरेशन पर विशेष जानकारी देते हुए बताया कि किस तरह इन्टरनेट का इस्तमाल करते हुए यूजर साइबर स्पेस में अकेले नहीं होते बल्कि उनके सभी रिसीव एवं सेंड किये हुए डाटा मोबाइल ऑपरेटर्स के पास रिकॉर्ड मे रहते है और इसी आधार पर पुलिस मोबाइल ऑपरेटर्स से यूजर की पूरी जानकारी एवं उनके डिटेल्स निकलवा सकती है और अपराधी को पकड़ सकती है। प्रभाकर ने अपने नेतृत्व में हल किये गए प्रकरण पर अपने अन्वेषण के तरीकों को बताया एवं अपने अनुभव साझा किये। उन्होंने ऑनलाइन फ्रॉड, एटीएम कार्ड क्लोनिंग एवं फ्रॉड कॉल से एटीएम पिन हासिल कर किस तरीके से कम उम्र के लोग साइबर क्राइम को अंजाम देते है इस पर भी अपने विचार व्यक्त किये।

दूसरे व्याख्यान में डॉ. सुभाष बनर्जी, सहायक प्राध्यापक, रसायन शास्त्र विभाग, गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर (छ.ग.) द्वारा नैनोटेक्नोलाजी इन मॉडर्न फारेंसिक इन्वेस्टीगेशन विषय पर व्याख्यान दिया। इस व्याख्यान में उन्होंने नैनोटेक्नोलाजी के इतिहास एवं उपयोगिता के बारे में बताते हुए नैनोटेक्नोलाजी की उपयोगिता का प्रमाण 600 बी.सी. से मिलती है। जैसे कि दिल्ली का लौह स्तम्भ, दिल्ली में कुतुब मीनार के निकट स्थित एक विशाल स्तम्भ है। यह अपने आप में प्राचीन भारतीय धातुकर्म की पराकाष्ठा है। यह कथित रूप से राजा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य (राज 375-493) से निर्माण कराया गया किन्तु कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पहले निर्माण किया गया, सम्भवत: 912 ईपू में है और ये आज भी जंग रहित है जिसमे नैनोटेक्नोलाजी के विज्ञानं का प्रयोग किया गया था।
डॉ. बनर्जी ने बताया कि क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में नैनोटेक्नोलाजी वर्तमान समय में बहुत उपयोगी साबित हो रहा है , अपराध अन्वेषण में साक्ष्यों का संग्रह करना बहुत ही महतवपूर्ण होता है इसके साथ ही महत्वपूर्ण होता है उसका विश्लेषण करना, मुख्यरूप से तब जब साक्ष्यों की मात्रा बहुत कम हो । नैनोटेक्नोलाजी की मदद से कम मात्रा में संचय किये गए साक्ष्यों का भी विश्लेषण किया जा सकता जो की भविष्य में फारेंसिक साइंस अन्वेषण की सबसे बड़ी उपलब्धि हो सकती है।