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विशेषज्ञ बोले यदि भारत को बनाना है 5 ट्रिलियन इकोनॉमी तो करना होगा ये काम

Jayant Kumar Singh

Publish: Nov 18, 2019 21:59 PM | Updated: Nov 18, 2019 21:59 PM

Bilaspur

वर्तमान में भारत में है 24 प्रतिशत वन, जरूरत है 33 प्रतिशत की, रोकना होगा कार्बन फुट प्रिंट

बिलासपुर। गुरु घासीदास विश्वविद्यालय (केन्द्रीय विश्वविद्यालय) के विश्वविद्यालय अनुदान आयोग-मानव संसाधन विकास केन्द्र में सहायक प्राध्यापकों के लिए छब्बीसवां उन्मुखीकरण कार्यक्रम दिनांक 13 नवम्बर, 2019 से प्रारंभ हुआ।

दिनांक 16 नवंबर को प्रथम सत्र के प्रथम व्याख्यान में गुरु घासीदास विश्वविद्यालय के वानिकी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ.एस.सी. तिवारी ने ''स्वच्छ पर्यावरण के लिए स्वच्छ वानिकी'' विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने जलवायु परिवर्तन पर एक संक्षिप्त परिचयात्मक भाषण दिया और स्वच्छ वानिकी के सामने की प्रमुख चुनौतियों का रखा। उन्होंने न केवल वैश्विक पहलों पर जोर दिया, बल्कि कार्बन फुट प्रिंट को रोकने के व्यक्तिगत प्रयासों पर भी बल दिया। वर्तमान भारत में 24 फीसदी वन आवरण है, जबकि जरूरत 33 फीसदी की है। भारत को 2024 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए हमें क्लाइमेट स्मार्ट सस्टेनेबल फॉरेस्ट्री (सीएसएफ), क्लाइमेट स्मार्ट सस्टेनेबल एग्रीकल्चर (सीएसए), और क्लाइमेट स्मार्ट सस्टेनेबल इंडस्ट्रीज (सीएसआई) पर ध्यान केंद्रित करना होगा। हमें भविष्य की पीढिय़ों के लिए एक सुंदर और रहने योग्य दुनिया सुनिश्चित करने के लिए कार्बन फुट प्रिंट को कम करना होगा।
तीसरे सत्र में प्रो.राजीव चौधरी, आचार्य, शारीरिक शिक्षा विभाग, रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर ने अनुसंधान पद्धति के बारे में व्यापक रूप से चर्चा की। उन्होंने शोध को दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया- मात्रात्मक और गुणात्मक। क्वांटिटेटिव रिसर्च वेरिएबल्स पर आधारित है जबकि क्वालिटेटिव रिसर्च आधारित विशेषताएँ हैं। उन्होंने शोध के पांच तरीकों के बारे में विस्तार से बताया- केस स्टडीज, दार्शनिक अध्ययन, ऐतिहासिक अध्ययन, सर्वेक्षण अध्ययन और प्रायोगिक अध्ययन। सर्वेक्षण अध्ययनों को तुलनात्मक अध्ययन, संबंध अध्ययन, पूर्वानुमान अध्ययन और वर्णनात्मक अध्ययन में विभाजित किया गया है। उन्होंने शोध के पांच तरीकों केस स्टडीज जो जीवित सामाजिक इकाइयों पर आधारित है, दर्शन, विचारों, अवधारणाओं और विचारों के आधार पर दार्शनिक अध्ययनय ऐतिहासिक अतीत के अध्ययन पर आधारित ऐतिहासिक अध्ययनय सर्वेक्षण अध्ययन और प्रायोगिक अध्ययन। स्कोप या यूटिलिटी रिसर्च के आधार पर तीन प्रकारों में विभाजित किया गया है- एक्शन रिसर्च, एप्लाइड रिसर्च और प्योर रिसर्च।
चौथे सत्र में प्रो.राजीव चौधरी ने डेटा विश्लेषण में विभिन्न सांख्यिकीय तकनीकों के बारे में व्यापक रूप से चर्चा की। सांख्यिकी को पैरामीट्रिक और गैर-पैरामीट्रिक दोनों डेटा में लागू किया जा सकता है। यह तय करने के लिए कि किन आंकड़ों को लागू किया जाना चाहिए, हमें माप का पैमाना जानना चाहिए। उन्होंने मापने के लिए चार पैमानों का उल्लेख किया। वे नॉमिनल स्केल, ऑर्डिनल स्केल, इंटरवल स्केल और रेशियो स्केल हैं। इसके अलावा पैरामीट्रिक आँकड़े तुल नात्मक सांख्यिकी और संबंध सांख्यिकी में विभाजित हैं।डेटा एनालिसिस सेठ जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तकनीकि शब्दावली जैसे इंडिपेंडेंट री-टेस्ट, वन सैंपल टी-टेस्ट, कॉन्फिडेंस ऑफ इंटरवल, लेवल ऑफ सिग्नेचर, डिग्री ऑफ फ्रीडम आदि को विश्लेषित करते हुए उसके बारे में समझाया।
कोर्स में देश के प्रतिष्ठित संस्थानों से विषय विशेषज्ञ प्रतिभागियों को व्याख्यान देने आएंगे। इस कोर्स के कोर्स कोऑर्डिनेटर यूजीसी-मानव संसाधन विकास केन्द्र के निदेशक डॉ. रत्नेश सिंह, सह-प्राध्यापक, शारीरिक शिक्षा विभाग हैं।

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