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दावा है यहां मिलती है नई जिन्दगी

Narendra Kumar Verma

Publish: Sep 16, 2019 03:01 AM | Updated: Sep 16, 2019 03:01 AM

Bhilwara

दावा है कि कैंसर का इलाज अब मुश्किल नहीं, जड़ी बूटियों एवं वनष्पति से इसे लाइलाज बीमारी को जड़ के साथ समाप्त किया जा सकता है। ये दावा और पुख्ता किया है भीलवाड़ा जिले के रायला स्थित नवग्रह आश्रम संस्थान मोती बोर का खेड़ा ने। इसी दावे की जांच परख के लिए प्रदेश के आयुर्वेद चिकित्सक भी गत १२ अगस्त २०१९ को यहां आश्रम में एकत्रित हुए। उन्होंने यहां विभिन्न सत्रों में आश्रम की जड़ी बूटियों एवं आयुर्वेद से कैंसर के साथ ही किडनी हद्य आदि रोगों के इलाज पर चर्चा की। वरिष्ठ आयुर्वेद्ध चिकित्सकों ने माना कि आयुर्

नरेन्द्र वर्मा
भीलवाड़ा। दावा है कि कैंसर का इलाज अब मुश्किल नहीं, जड़ी बूटियों एवं वनष्पति से इसे लाइलाज बीमारी को जड़ के साथ समाप्त किया जा सकता है। ये दावा और पुख्ता किया है भीलवाड़ा जिले के रायला स्थित नवग्रह आश्रम संस्थान मोती बोर का खेड़ा ने। इसी दावे की जांच परख के लिए प्रदेश के आयुर्वेद चिकित्सक भी गत १२ अगस्त २०१९ को यहां आश्रम में एकत्रित हुए। उन्होंने यहां विभिन्न सत्रों में आश्रम की जड़ी बूटियों एवं आयुर्वेद से कैंसर के साथ ही किडनी हद्य आदि रोगों के इलाज पर चर्चा की। वरिष्ठ आयुर्वेद्ध चिकित्सकों ने माना कि आयुर्वेदिक दवाओं व जड़ी बूटियों का नियमित सेवन परहेज रखते हुए किया जाए तो कैंसर व अन्य रोगों से मुक्ति संभव है।

उम्मीद एवं विश्वास पर दुनियां टिकी हुई है। संभवत: नवजीवन मिलने की इसी उम्मीद के कारण नवग्रह आश्रम संस्थान मोती बोर का खेड़ा का नाता इन दिनों देश-दुनियां से जुड़ा हुआ है। यहां लाइलाज रोग से ग्रस्त सैकड़ों लोग रोग से मुक्त की आस में आते है। शनिवार व रविवार को तो यहां का नजारा ही किसी तीर्थ स्थल से कम नहीं होता है। संस्थान का दावा है कि यहां जड़ी बूटियों व वनोष्पति औषधि से कैंसर, क्षय व किडनी रोग तक का इलाज संभव है और इसी के बूते वो समूचे भारत को कैंसर मुक्त करने के संकल्प को लेकर रोगियों की सेवा में जुटे हुए है। संभवत: यही कारण है कि जिन्दगी के झांझावतों से जूझ रहे लोग देश एवं विदेश के कोने से यहां पहुंच रहे है। असहाय रोगों से पीडि़त लोगों व उनके परिजनों में से कईयों ने आश्रम में बातचीत में कहा कि यहां आने से उन्हें नई जिन्दगी मिलने की राह खुली है। इनमें कई तो एेसे थे जो कि कैंसर होने की आशंका के चलते ही यहां उपचार करवा रहे है। जिला मुख्यालय से करीब तीस किलोमीटर दूर रायला स्थित मोती बोर का खेड़ा के नवग्रह आश्रम संस्थान कैंसर रोग के निदान केंद्र के रूप में अपनी पहचान बनान हुए है। यहां प्रति सप्ताह तीन हजार से ज्यादा रोगियों को नि:शुल्क कैंसर रोग की दवा दी जाती है।

आश्रम संस्थापक हंसराज चौधरी दावा करते है कि भीलवाड़ा का नवग्रह आश्रम देश व दुनियां के विभिन्न भागों से आने वाले रोगियों का आयुर्वेद व वानस्पितक चिकित्सा पद्धति से उपचार किया जाता है और ये पीडितों के लिए वरदान साबित हो रहा है। चौधरी बताते है कि उनका सपना है कि भारत कैंसर मुक्त हो। आश्रम की खास बात यह है कि यहां आने वाले कैसर रोगी को संबंधित दवा नि:शुल्क दी जाती है। चौधरी मानते है कि अभी भी जागरूकता की कमी है, रोगी अधिक आने चाहिए, रोगी नहीं आए तो चलेगा। उनके परिजन या स्वयंसेवक भी पहुंच कर दवा लेकर रोगी तक पहुंचा देवें तो उनका संकल्प पूरा होने में समय नहीं लगेगा।

चौधरी बताते है कि आश्रम की स्थापना २०१४ में की यहां ९ ग्रह, १२ राशियों एवं २७ नक्षत्रों के प्रतिनिधि के ४११ प्रकार के औषधीय पौधे है। यह एक विश्व रिकार्ड ही है कि एक ही परिसर में इतनी तादाद में औषधीय पौधे केवल नवग्रह आश्रम में ही मौजूद है। इनमें कई दुर्लभतम पौधों हींग, गुड़मार, दमाबेल आठों प्रकार की तुलसी, नोनी, चित्रक के साथ साथ भारत सरकार द्वारा विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुके बीस से अधिक प्रजातियों का रोपण एवं पोषण हो रहा हैं।

यहां रोपित औषधिय पौधों से केंसर, टीबी, डायबिटिज जैसी गंभीर बिमारियों का नि:शुल्क उपचार किया जाता है। दुर्लभ औषध पत्तियों से मरीज का इलाज किया जाता हैं। इन पत्तियों से केंसर, किडनी,टीबी, डायबिटिज के अलावा दमा, टाइफ ाइड, ल्यूकोरिया, चर्मरोग, रेतीरोग रसौली, गठिया बाय, पाइल्स, पीलिया, साईटिका, मानसिक रोग जैसी बीमारियों का उपचार होता है।

चौधरी को केंद्र सरकार के नेशनल मेडीसन प्लांट बोर्ड आयुष मंत्रालय की ओर से वानस्पतिक व आयुर्वेद क्षेत्र में रिसोर्स पर्सन (संदर्भ व्यक्ति) भी नियुक्त किया है। चौधरी सहायक कृषि अधिकारी भी रह चुके है। वो भीलवाड़ा डेयरी के निदेशक भी थे। चौधरी बताते है कि १६ जून २०१३ को केदारनाथ त्रासदी के वो चश्मदीद गवाह रहे। उस त्रासदी का वो खुद शिकार होकर १५ दिनों के पश्चात एक नया जन्म लेकर (केदारनाथ से बचते बचाते १९ जून को एक संत के आदेशानुसार शेष जीवन मानव सेवा मे लगा देने के वचन के साथ ) गांव पहुंचे। इस पर गांव पहुंच कर उन्होंने अपना शेष जीवन मानव सेवा के लिए देने का निर्णय ले लिया। उन्होंने संस्कृत भाषा सीख कर आयुर्वेद का अध्ययन प्रांरभ किया और आयुर्वेद एवं पंचकर्मा का डिप्लोमा भी पास किया।