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मां कहती है गीता, अम्मा बोले सुरैया... बॉर्डर के घर-घर कान्हा तेरी गैया...

Ratan Dave

Publish: Aug 24, 2019 08:29 AM | Updated: Aug 23, 2019 19:08 PM

Barmer

- कृष्ण जन्माष्टमी विशेष

- यहां हिन्दू गाय को मां तो मुसलमान अम्मा बोलता है
- पश्चिम राजस्थान के सीमावर्ती इलाकों में गायों के बिना जिन्दगी अधूरी है

 

रतन दवे.

बाड़मेर. गोधूली की वेला... गाय घर नहीं लौटी तो घर की दहलीज पर खड़ी सुरैया आवाज लगाती है, अम्मा..अम्मा..अम्मा। इसी वक्त घर की ड्योढी पर चढ़कर गीता, आ मां...आ मां.. कहती नजर आती है। यह दोनों संबोधन गाय के लिए है। सीमावर्ती बाड़मेर जिले के बॉर्डर के उन गांवों में जहां हिन्दू-मुसलमान हिलमिल रहते हैं, गायों के प्रति यह स्नेह देख कान्हा भी मोहित हो जाए।

दरअसल बॉर्डर के बाखासर (बाड़मेर) से खुहड़ी (जैसलमेर) तक गायों का पूर इलाका है, जहां थारपारकर नस्ल की उत्तम गाय घर-घर है। भारत-पाक बंटवारे के बाद यहां सिंधी मुस्लमान और हिन्दू बसेे हुए हैं। इनकी गृहस्थी का आधार गोपालन रहा है। घरों में 50 से 100 गाय पालने वाले भी है।

हिन्दू-मुसलमान दोनों के लिए गाय का महत्व है। बाखासर से गडरारोड़, रोहिड़ी, द्राभा, पांचला, म्याजलार खुहड़ी तक करीब 400 किलोमीटर तक ये गांव है, जिनमें प्रत्येक गांव में आबादी 500 की ही है, लेकिन गोधन 1500 से 2000 के करीब हैं।

पानी की कमी, पर घी भरपूर

- पांचला, द्राभा सहित बॉर्डर के गांवों का 'घीÓ की साख दूर-दूर तक है। छह सौ से आठ सौ रुपए प्रतिकिलो घी के भाव इन गांवों में है, जो लोग शुद्धता की वजह से खरीदना पसंद करते हैं।
अब बनने लगा है पनीर

- परिवहन के साधनों की कमी के चलते दूध की बिक्री यहां समय पर नहीं हो पाती और दाम भी पूरे नहीं मिल पाते। ऐसे में इन गांवों के लोगों ने अब पनीर बनाना शुरू कर दिया है। बीएसएफ और बाड़मेर शहर में यह पनीर बिक्री को पहुंच रहा है।
विकट स्थितियों में गोसेवा

- सरकारी हौदियां में पर्याप्त मात्रा में नहीं होने पर पारंपरिक बेरियों से पानी लाना होता है। महिलाएं खुद जुटकर इन बेरियों से पानी सिंचती है।

चारा

तीन साल से लगातार अकाल है। ग्रामीण मेहनत मजदूरी कर चारे का प्रबंध भी करते हैं। इसके लिए कर्ज लेने से भी इनकार नहीं।

बीमारी

- जरूरी है कि यहां डबल ए क्लास का पशु चिकित्सालय हों लेकिन यहां सुविधाएं 50 से 100 किमी दूर है, हारी-बीमारी में ग्रामीण देसी उपचार के भरोसे हैं।

गायें जाती है केन्द्रीय अनुसंधान केन्द्र

- केन्द्रीय अनुसंधान केंद्र की टीम हर साल यहां आती है। उत्तम नस्ल का गोवंश ले जाती है।

साझा संस्कृति जीते हैं

- गाय हमारे घरों में अम्मा के संबोधन से ही बुलाई जाती है। वो घर न लौटे तो बेचैनी होती है, ऐसा ही माहौल हिन्दू परिवारों में है। यह एकमात्र इलाका है जहां हिन्दू गाय को मां और मुसलमां अम्मा...कहता है।

- शम्मा खां, पूर्व प्रधान
बार्डर पर देखिए गोमाता की सेवा

- आठ-दस मील से पानी लाना, चारे के लिए मीलों जाना, गायों के लिए पूरे परिवार का हर वक्त बेचैन रहना और फिर दूध-दही भरपूर। गाय को यहां जीते हैं और गाय हमारे साथ जीती है।
-दीवानसिंह, पांचला