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राजस्थान रोडवेज की पुरानी बसे बीच रास्ते मान रही हार, नई बसें खरीदने में बजट का रोड़ा, घट रहा यात्रीभार

Varun Kumar Bhatt

Publish: Sep 11, 2019 16:07 PM | Updated: Sep 11, 2019 16:07 PM

Banswara

- नई से नहीं सरोकार, पुरानी पर दरोमदार
- बीच रास्ते में हांफ रही रोडवेज बसें
- यात्रियों को होना पड़ता है परेशान

बांसवाड़ा. राजस्थान राज्यपथ परिवहन निगम नई बसों की खरीद तो दूर, सोच भी नहीं पा रही है। हालात ये है कि बूढ़ी बसे दौड़ लगवाने से बीच रास्ते में हांफ कर खड़ी हो रही हैं। यह स्थिति जिला आगार ही नहीं, प्रदेश के अन्य आगारों की भी है। खस्ताहाल बसों को जैसे-तैसे मरम्मत के बाद दोबारा रूट पर दौड़ाया जा रहा है और इसका खमियाजा यात्रियों को भुगतना पड़ रहा है।

ये है हालात
जानकारी के अनुसार बांसवाड़ा आगार में प्रति सप्ताह दो और प्रदेश में प्रतिदिन औसतन 350 बसें खराब हो रही हैं। वर्तमान में प्रदेश के आगारों में करीब 3 हजार 100 बसें संचालित हैं। जिनमें करीब 1400 बसें कंडम हैं। पर्याप्त बसों की पूर्ति के लिए करीब 5 हजार बसों की आवश्यकता है, लेकिन संचालन 3 हजार 459 बसों का है। स्वयं की इतनी बसें नहीं होने से अनुबंधित 960 बसों का सहारा लिया जा रहा है, जो निगम के राजस्व को क्षति पहुंचा रहा है। सूत्र बताते हैं कि हालात ऐसे ही रहे तो दिसंबर 2019 तक रोडवेज के पास करीब 1950 बसें रह जाएगी। बसों में ब्रेकडाउन, बैट्री डाउन, कबानी के पट्टे टूटने, स्टेपनी फैल जैसी समस्या आम है।

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नीलामी की नहीं योजना
राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम के पास कंडम बसों की नीलामी की योजना नहीं है। एक बस की उम्र 6 से 7 साल होती है, लेकिन रूटों पर 8 से 10 साल पुरानी बसों को दौड़ाया जा रहा है। इससे यात्रीभार भी घट रहा है। जिले में 86 शिड्यूल हैं, लेकिन बसों के खराब होने से ये भी कम हो रहे हैं।

खरीद की तैयारी 1 हजार की
सूत्रों ने बताया कि निगम करीब एक हजार बस खरीद की कवायद में जुटा है। जिनमें 50 बसें इलेक्ट्रिकल बैट्री युक्त शामिल हैं। इसमें भी बजट का रोड़ा है। बताया जाता है कि बीते पांच साल में प्रदेश में 500 बसों की खरीद हुई, जबकि इतनी बसों की हर वर्ष जरूरत रहती है। ऐसे में अब तक पांच सालों में ढाई हजार बसों की खरीद हो जानी थी।

आगे ही कार्रवाई संभव
आगार को नई बसों की जरूरत है। आए दिन इनमें खराबी आ रही है। यात्रियों को परेशानी होती है। उच्चाधिकारियों को अवगत करा रखा है। प्रदेश के अन्य आगारों में भी ऐसी ही स्थिति है। आगे से ही कोई कार्रवाई संभव है।
रविकुमार मेहरा मुख्य प्रबंधक आगार, बांसवाड़ा।