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वागड़ के दोनों जिलों को जोडऩे के लिए 45 करोड़ से बनाया पुल, लेकिन डूंगरपुर-बांसवाड़ा आगार ने एक भी बस नहीं की शुरू

Varun Kumar Bhatt

Publish: Nov 22, 2019 12:02 PM | Updated: Nov 22, 2019 12:02 PM

Banswara

Galiakot Bridge, Galiakot Pul : दोनों ही आगार बसें शुरू करे तो विश्व विख्यात पीर-फखरुद्दीन की दरगाह और शीतला माता मंदिर के तीर्थ यात्रियों को मिलेगी बड़ी राहत


चीतरी/डूंगरपुर. वागड़ के दोनों जिलों डूंगरपुर और बांसवाड़ा के मध्य माही नदी वर्ष पर्यन्त बहने से वर्षों बाद भी इस क्षेत्र से दोनों जिलों को जोडऩे के लिए गलियाकोट में हाइलेवल पुल की दरकार थी। पुल नहीं बनने से लोगों को समय के साथ ही किराया भाड़े की दोहरी मार पड़ते देख प्रदेश सरकार ने 45 करोड़ रुपए की लागत से हाइलेवल ब्रिज बनाया। ताकि, दोनों जिलों का संपर्क बढ़े तथा वागड़ ही नहीं गुजरात, मध्यप्रदेश आदि क्षेत्रों से गलियाकोट पीर फखरुद्दीन की दरगाह और शीतला माता मंदिर दो विश्व विख्यात धार्मिक स्थलों में दर्शनार्थ आने वाले तीर्थयात्रियों को सुविधा हो। इसके बावजूद पुल निर्माण के करीब एक वर्ष दस माह उपरांत भी डूंगरपुर और बांसवाड़ा आगार एक भी बस तक शुरू नहीं कर पाया है। जबकि, पुल बनने के बाद उदयपुर आगार ने अपनी बस सेवा शुरू कर दी और इस पुल से दिन में दो बार बस खचाखच सवारियां भर कर भारी राजस्व वसूल रही हैं। गलियाकोट धार्मिक एवं व्यापारिक लिहाज से काफी समृद्ध क्षेत्र है। गुजरात के कडाणा बांध का निर्माण होने से इस ऐतिहासिक कस्बे पर भले ही उपेक्षा का ग्रहण लगा हो, लेकिन धार्मिक लिहाज से यह क्षेत्र न केवल देश अपितु विदेशों तक ख्याति लिए हुए हैं। दाउदी बोहरा समुदाय की विश्व विख्यात पीर-फखरुद्दीन की दरगाह, तो जन-जन की आस्था स्थल शीतला माता मंदिर यहां है, तो क्षेत्रपाल दादा की ख्याति सुदूर तक है। जहां देश-विदेश से हजारों यात्री रोजाना दर्शन-वंदन के लिए आते हैं। यहां के लोग बताते है कि चीतरी एवं गलियाकोट कस्बे में रोजाना गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र सहित प्रदेश के कोने-कोने से दर्शनार्थी आते हें। तीर्थयात्रियों की सुविधाओं को ध्यान में रख प्रदेश सरकार ने 45 करोड़ की लागत से माही नदी पर पुल का निर्माण करवाया। पुल का विधिवत जनवरी 2018 से शुरू हो गया। यहां से निजी वाहनों की आवाजाही भी शुरू है। लेकिन, राजस्थान रोडवेज के डूंगरपुर-बांसवाड़ा आगार की एक भी बस शुरू नहीं हो पाई है। इससे यात्रियों की समस्या पुल बनने के बाद भी जस की तस है। तीर्थयात्रियों को लम्बी दूर पार कर ही गंतव्य तक पहुंचना पड़ रहा है। गलियाकोट में पीर फखरुद्दीन की दरगार, तो शीतला माता मंदिर, चीतरी में क्षेत्रपाल मंदिर जहां अगाध आस्था के केन्द्र हैं। यहां शुक्रवार और रविवार को देश भर से श्रद्धालु आते हैं। वहीं, गलियाकोट पुल से अरथुना की दूरी महज आठ किलोमीटर बताई जाती है। यहां पुरातत्व विभाग अंतर्गत स्थित मंदिर शिल्प एवं पुरा महत्व की अनमोल धरोहरे हैं। दोनों ही आगार की बसें शुरू होने से इन दोनों जिलों में अध्यात्मक एवं पुरा महत्व की कडिय़ां भी जुड़ेगी।

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2012 में हुआ था शिलान्यास, बांसवाड़ा की दूरी 40 किमी, पर अभी 82 किमी का सफर : - गलियाकोट पुल का शिलान्यास अशोक गहलोत सरकार ने अपने पूर्व के कार्यकाल में सात अप्रेल 2012 में किया था। पुल का कार्य वर्ष 2017 में पूर्ण हो गया। लेकिन, छह माह तक पुल पर आवाजाही पर प्रतिबंध था। पर, जनवरी 2018 में यह पुल आमजन के लिए खोल दिया। इससे लोगों को आस लगी थी कि अब यहां से सरकारी बसों की भी आवाजाही शुरू होगी। गलियाकोट से बासवाड़ा जिला मुख्यालय की दूरी माही नदी पुल से मात्र 40 किलोमीटर पड़ती है। लेकिन, दोनों आगार से एक भी बस शुरू नहीं होने से बांसवाड़ा से गलियाकोट दरगार एवं मंदिरों में दर्शनार्थ आने वाले यात्रियों को 82 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ रहा है। वहीं, यहां के वाशिंदों को बांसवाड़ा जाने के लिए भी सागवाड़ा आकर गाडिय़ां बदल-बदल कर बांसवाड़ा पहुंचना पड़ रहा है। इससे यात्री भाड़े और समय दोनों की मार पड़ रही है। इधर, गलियाकोट बोहरा समाज प्रतिनिधि खोजेमा गाकड़ कहते है कि राज्य परिवहन बसों का संचालन माही नदी पुल से शुरू होगा, तो जायरिनों एवं दर्शनार्थियों को बड़ा लाभ होगा। यात्री किराया और समय दोनों की बचत होगी। गलियाकोट शीतला माता मंदिर के व्यवस्थापक हर्षित भावसार ने बताया कि माता के दरबार में दाहोद, झालोद, कुशलकोट, कुशलगढ़ एवं झाबुआ की तरफ से बड़ी संख्या में दर्शनार्थियों की आवाजाही रहती है। इसके बावजूद यात्री गलियाकोट आने के लिए अगरपुरा पुल से वाया सागवाडा होकर आ रहे हैं। माही पुल से बसों की आवाजाही होनी चाहिए।

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