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महकेपार में बिरसा मुंडा की प्रतिमा का हुआ अनावरण

Mukesh Yadav

Publish: Nov 18, 2019 15:54 PM | Updated: Nov 18, 2019 15:54 PM

Balaghat

साहस का नाम है- बिरसा मुंडा


तिरोड़़ी/महकेपार। भारत के इतिहास में आदिवासी जननायक बिरसा मुंडा एक ऐसे नायक थे, जिन्होंने भारत के झारखंड में अपने क्रांतिकारी चिंतन से उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तराद्र्ध में आदिवासी समाज की दशा और दिशा बदलकर नवीन सामाजिक और राजनीतिक युग का सूत्रपात किया। वह केवल जननायक नहीं बल्कि साहस का नाम थे। यह विचार बिरसा मुंडा के 144 वें जन्मोत्सव समारोह को महकेपार में संबोधित करते हुए कार्यक्रम अध्यक्ष शकुन प्रधान राष्ट्रीय मूल निवासी महिला संघ प्रदेशाध्यक्ष ने कहे।
अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद कटंगी, आदिवासी युवा संघठन निगरानी समिति, गोंडवाना स्टूडेंट संघ कुड़वा, आदिवासी गोवारी समाज संगटन महकेपार, बौद्ध समाज संघठन महकेपार, बिरसा ब्रिगेट संघठन खरपडिय़ा, अखिल आदिवासी कोल समाज विकास संस्था तिरोड़ी, आदिवासी युवा संगठन पठार क्षेत्र, गोंडवाना महासभा तिरोड़ी एवं सर्व आदिवासी समाज पठार क्षेत्र के संयुक्त तत्वाधान में महकेपार के पावर हाउस चौक में रविवार को बिरसा मुंडा का 144 वां जन्मोत्सव एवं प्रतिमा अनावरण समारोह बड़े ही धूमधाम एवं हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर विधायक अर्जुनसिंह काकोडिय़ा ने बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की। इन्हीं के हस्ते मूर्ति का अनावरण किया गया। इस मौके पर सतीश पेंदाम, डॉ घनश्याम परते, हीरासन उइके, रमा टेकाम, विदेश काकोडिय़ा, अधिवक्ता संजय खोब्रागड़े, लच्छु अग्रवाल, भुमक जेठूसिंह तेकाम विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहे।
निकाली गई कलश यात्रा
इस अवसर पर प्रात: सुबह साढ़े 7 बजे लघु गोगों ग्राम देवता पूजन तथा कलश यात्रा निकाली गई, जिसने पूरे गांव का भम्रण किया। इसके बाद भुमका कैलाश उइके एवं सुभाष धुर्वे ने गोंडी रीति-रिवाज से पूजा-अर्चना संपन्न कराई। दोपहर में प्रतिमा का अनावरण के बाद मंचीय कार्यक्रम का आयोजन हुआ। आंमत्रित अतिथियों ने अपने-अपने विचार रखें।
संघर्ष पर डाला प्रकाश
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि विधायक अर्जुन काकोडिय़ा ने बिरसा मुंडा के संघर्ष पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बिरसा ने गांव-गांव घूमकर लोगों में राजनीतिक, धार्मिक जागृति लाई बल्कि अबुआ: दिशोम राज (हमार देश में हमार शासन) का बिगुल फूंका। संजय खोब्रागड़े ने कहा आज भी देश की कुल आबादी का लगभग ग्यारह प्रतिशत आदिवासी है। आजादी के सात दशकों के बीत जाने के बाद भी भारत की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले आदिवासी आज भी उपेक्षित है। कार्यक्रम के संचालन में अध्यक्ष फुलसिंह परते, सखराम इनवाती, एमएल भलावी, डीएस कुभरे सहित अन्य का सहयोग रहा।

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