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क्यों चढ़ाया जाता है भगवान को भोग?

Rajeev sharma

Publish: Sep 21, 2016 10:48 AM | Updated: Sep 21, 2016 10:48 AM

Astrology and Spirituality

भोजन करने से पूर्व भगवान को भोग लगाने का विधान है जिससे कि हम केवल शुद्ध और उचित आहार ही ग्रहण करें।

शुद्ध एवं उचित आहार भगवान की उपासना का एक अंग है। भोजन करते समय किसी भी अपवित्र खाद्य पदार्थ का ग्रहण करना निषिद्ध है। यही कारण है कि भोजन करने से पूर्व भगवान को भोग लगाने का विधान है जिससे कि हम केवल शुद्ध और उचित आहार ही ग्रहण करें। 




श्रीमद् भागवद् गीता के सत्रहवें अध्याय में भोजन के तीन प्रकारों, सात्विक, राजसिक एवं तामसिक का उल्लेख मिलता है। 




सात्विक आहार शरीर के लिए लाभकारी होते हैं और आयु, गुण, बल, आरोग्य तथा सुख की वृद्धि करते हैं। इस प्रकार के आहार में गौ घृत, गौ दुग्ध, मक्खन, बादाम,  काजू, किशमिश आदि मुख्य हैं। 




तामसिक भोजन किसी भी दृष्टि से शरीर के लिए लाभकारी नहीं होते। इनके सेवन से मनुष्य की बुद्धि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। श्रीमद् भागवद् गीता के अनुसार सात्विक भोजन करने वाला दैवी संपत्ति का स्वामी होता है जबकि राजसिक और तामसिक भोजन करने वाला आसुरी संपत्ति का मालिक होता है। 




वास्तु शास्त्र के अनुसार भोजन सदैव पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करते हुए ही करना चाहिए। चूंकि दक्षिण दिशा यम की दिशा होती है इसलिए इस दिशा की ओर मुख करके भोजन करना दोषपूर्ण है, इससे किया गया भोजन तन और मन दोनों को दूषित करता है तथा शक्ति का क्षय करता है। 




अथर्ववेद के अनुसार भोजन हमेशा भगवान को अर्पित करने के बाद ही करना चाहिए। भोजन करने से पूर्व हाथ व पैरों को साफ पानी से धो लेना चाहिए।