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'पशुवध के खिलाफ है वैदिक साहित्य, कहीं नहीं किया गया है पशुओं को मारने का समर्थन'

Rajeev sharma

Publish: Feb 06, 2017 15:39 PM | Updated: Feb 06, 2017 15:39 PM

Astrology and Spirituality

अचरज की बात यह है कि ऐसे लोग केवल गोवध के मामले में ही धर्मनिरपेक्ष हैं, अन्य जानवरों की रक्षा करने कोई भी प्रयास उन्हें 'हिन्दू' होने की उनकी परिभाषा से बाहर निकाल देता है।

जयपुर. ज्यादातर लोगों को लगता है कि मीडिया में जो कुछ कहा जाता है, वही सही होता है। लेकिन, हमेशा सही हो यह जरूरी तो नहीं। कुछ निर्माता अपने हानिकारक उत्पादों और प्रक्रियाओं के पक्ष में भ्रामक प्रचार करने के लिए मीडिया का इस्तेमाल करने से नहीं चूकते। 




अगर शार्क पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है तो तुरंत इसके विरोध में लेख छपने लगते हैं। अगर आप मालूम करेंगे तो पाएंगे कि विदेशी शार्क पकडऩे वाले जहाज मालिकों के लिए काम करने वाली पीआर एजेंसी ने ये लेख छपवाए हैं। 




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जब महाराष्ट्र में बूचडख़ानों पर रोक लगी तो अपने मतलब के लिए बहुत से लोग इस फैसले की आलोचना करते नजर आए। इनमें अवैध मीट का निर्यात करने वाले, अवैध बूचडख़ानों के मालिक, रेस्तरां, बीफ  विक्रेता, ट्रांसपोर्टर और कुछ पुलिस वाले भी खुलकर सामने आ गए। 




फिर कुछ तथाकथित 'धर्मनिरपेक्ष' लोग इनके समर्थन में उतर आए। ऐसे लोग बिना देश हित सोचे-समझे पब्लिसिटी के लिए किसी भी मामले में कूद पड़ते हैं। अचरज की बात यह है कि ऐसे लोग केवल गोवध के मामले में ही धर्मनिरपेक्ष हैं, अन्य जानवरों की रक्षा करने कोई भी प्रयास उन्हें 'हिन्दू' होने की उनकी परिभाषा से बाहर निकाल देता है। इनकी दलीलों का आधार ना तो अर्थव्यवस्था है, ना ही किसानों और खेती का हित। 




वे समझ ही नहीं पा रहे हैं कि इसके जरिए होने वाली गाढ़ी कमाई का धन आतंककारियों तक भी पहुंचाया जाता है। अवैध तस्करी  के लिए रिश्वत की मोटी रकम वसूलने वाले कुछ पुलिसकर्मियों के कारण यह पूरा महकमा बेअसर हो चला है।




 ऐसे लोगों का सीधा सा तर्क है कि प्रत्येक व्यक्ति को वह सब खाने की अनुमति होनी चाहिए जो वह खाना चाहता है। और, यह भी कि हिन्दू भी सदा से ही गौमांस का सेवन करते आए हैं और वैदिक गं्रथों में भी इसका उल्लेख है। जहां तक पहले बिन्दु का सवाल है, 90 फीसदी बीफ  का निर्यात होता है। इसलिए यह खाने-खिलाने का सवाल नहीं है बल्कि साफ  तौर पर व्यापार से जुड़ा है। 




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धनाढ्य इस धंधे में लिप्त हैं और उनमें से कई तो भारतीय नागरिक भी नहीं हैं। दूसरा, यही वे लोग हैं, जो युवाओं को शराब, सिगरेट, पान मसाला और अन्य रासायनिक तत्वों का सेवन करने देने के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। आखिर ये क्या एक ऐसी सरकार चाहते हैं, जहां हर कोई अपनी मर्जी का मालिक हो और परिणाम की परवाह किए बिना चाहे जो करे। या ऐसी सरकार जो सबके लिए सर्वोत्तम हो, वही नियम बनाए। आइए अब बात करते हैं दूसरे बिंदु की, जो मैं कहना चाहती हूं। 




बार-बार यह लिखा गया कि वेदों के अनुसार, हिन्दू गौमांस खाते थे और ब्राह्मण कुछ रीतियों के दौरान पशुओं की बलि देते थे। ये 'बुद्धिजीवी' वैदिक साहित्य के गलत ढंग से किए गए पाश्चात्य अनुवाद में से कुछ अप्रासंगिक सा उद्धरण ले लेते हैं । 




अपने व्यापारिक हित साधने के लिए उनका इस्तेमाल करते हैं। प्राचीन ग्रंथों की इस गलत व्याख्या को कोई चुनौती भी नहीं देता। वेदों की व्याख्या मध्यकाल में लिखी गई टिप्पाणियों से ही ली जाती है और वाममार्गियों या तांत्रिकों द्वारा वेदों के नाम पर किए गए दुष्प्रचार को कई बार वैदिक व्याख्या मान लिया जाता है। 




पश्चिम के विद्वानों ने संस्कृत के आधे-अधूरे ज्ञान के चलते वेदों के अनुवाद के नाम पर हमारे प्राचीन ग्रंथों को गलत ढंग से प्रस्तुत किया।  श्री वद्र्धमान परिवार और अखिल भारतीय गौ सेवा संघ ने वेदों के इस प्रकार गलत प्रस्तुतीकरण पर काफी अच्छा अनुसंधान किया है। मैं उसमें से ही कुछ अंश यहां उद्धृत कर रही हूं-  'गौर्मे माता वृषभ: पिता मे दिवं शर्मजगती मे प्रतिष्ठा' अर्थात् 'गाय हमारी मां है और बैल हमारे पिता। ये दोनों ही जीव मुझे पृथ्वी और स्वर्ग दोनों के ही आनंद देते हैं। 




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गाय मेरी जिंदगी का महत्वपूर्ण अंग है। शुरुआत करते हैं, पहली ही तथाकथित व्याख्या से, जिसके अनुसार, वैदिक यज्ञों में पशु बलि को आम बताया गया है। 'यज्ञ' शब्द की उत्पत्ति ''यज'' धातु में नन प्रत्यय लगाने से हुई है। यज शब्द के तीन अर्थ हैं- पहला है देवपूजा, दूसरा-संगति कीर्तन (एकता) व तीसरा दान। 




ये सब मानव के प्राथमिक कर्तव्य हैं। यज्ञ का महत्व केवल वेदों में ही नहीं बल्कि हमारे प्राचीन भारतीय साहित्य में भी देखने को मिलता है। यज्ञ में पशु वध का कहीं कोई उल्लेख है ही नहीं बल्कि वैदिक शब्दावली निर्कुट के अनुसार, यज्ञ को अध्वरा भी कहा गया है चूंकि ध्वरा का अर्थ हिंसा इसलिए अ+ध्वरा (अध्वरा) का अर्थ हुआ कि जहां यज्ञ है वहां हिंसा प्रतिबंधित है। वेदों में बहुत से मंत्रों में यज्ञ के लिए अध्वरा का प्रयोग हुआ है। 




यजुर्वेद  में साफ तौर पर कहा गया है कि 'मैं सभी प्राणीजन(सर्वानि भूतानि) को मित्रवत् देख सकता हूं!' लेकिन बीफ सेवन करने वाले, निर्यातक और धर्मनिरपेक्ष लोग अश्वमेध यज्ञ, नरमेध, अजमेध, गौमेध यज्ञों पर सवाल उठाते हुए तर्क देते हैं कि मेध मतलब वध और वेदों में नर वध तक की बात कही गई है। 




मेध शब्द का अर्थ जरूरी नहीं कि हत्या ही हो। इसका अर्थ है जरूरत और विवेकानुसार की गई कार्यवाही। मेध शब्द के मूलभूत अर्थ से भी यह स्पष्ट है, जैसे अगर यज्ञ अध्वरा या अहिंसा वाले होते हैं तो हम यह कैसे मान लें कि मेध का मतलब हिंसा है। 




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एक बुद्धिमान व्यक्ति को मेधावी कहा जाता है। बहुत से बच्चों के नाम मेध रखे जाते हैं। तो क्या ये हिंसक लोग हैं? या फिर बुद्धिमान? वेदों में वर्णित सैकड़ों मंत्र पशुवध के खिलाफ  हैं और उस पर प्रतिबंध की बात करते है।