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Gandhi 150: अमृतसर में अंकुरिंत हो गया था सत्याग्रह आंदोलन

Devkumar Singodiya

Publish: Oct 02, 2019 17:51 PM | Updated: Oct 02, 2019 17:51 PM

Amritsar

Mahatma Gandhi 150: राष्ट्रपिता महात्मा गांधी 1919 में अमृतसर आए और उन्होंने देशवासियों के मन में स्वतंत्रता प्राप्ति की अलख जगाई थी। इसलिए पंजाब सरकार ने ऐतिहासिक कंपनी बाग में बापू की प्रतिमा स्थापित की।

अमृतसर. अमृतसर में 26, 27 व 28 दिसंबर 1919 को कांग्रेस का अधिवेशन एचिसन पार्क (अब गोलबाग) में हुआ था। इसमें पंडित मोतीलाल नेहरू, महात्मा गांधी, मोहम्मद अली जिन्ना, सैफुद्दीन किचलू, डॉ. हाफिज मोहम्मद बशीर, डॉ. सत्यापाल, लाल गिरधारी लाल, सेठ राधाकृष्ण, माहशा रत्न चंद, चौधरी बुग्गा मल शामिल हुए।


अंग्रेज सरकार रॉलेट एक्ट लागू कर भारतीयों से अपील, दलील और वकील का अधिकार छीन चुकी थी। कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता और महात्मा गांधी भी इन दमनकारी नीतियों से आहत थे। तब महात्मा गांधी व पंडित मोतीलाल नेहरू ने अधिवेशन में अंग्रेजों के खिलाफ सत्याग्रह आंदोलन चलाने का निर्णय किया और असहयोग आंदोलन का अंकुर भी इसी अधिवेशन में फूटा।

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जलियांवाला बाग नरसंहार से आहत थे बापू

कांग्रेस नेताओं ने देश की जनता से आह्वान किया कि वे पूरे देश में असहयोग आंदोलन चलाएं। देश के हर नागरिक ने सत्याग्रह व असहयोग आंदोलन में भाग लिया। इतिहासकार रामचंद्र गुहा की पुस्तक में यह दावा किया गया है कि जलियांवाला बाग नरसंहार ने गांधी जी को झकझोर दिया। उनके कहने के बाद भी जब आरोपित अफसरों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई तो वे अंग्रेजों के कट्टर विरोधी बन गए। गुहा की किताब 'शहादत से स्वतंत्रता' में दावा किया गया है कि बापू ने 1919 से पहले कभी पंजाब का दौरा नहीं किया। 13 अप्रैल 1919 को डायर ने बैसाखी के मौके पर जलियांवाला बाग में आए निहत्थे लोगों पर गोली चलवा दी। नरसंहार से बापू बेहद आहत थे।

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इसलिए बापू ने चलाया आंदोलन

गुहा की किताब 'शहादत से स्वतंत्रता' में दावा किया गया है कि उन्होंने ब्रिटिश वायसरॉय से कहा कि जनरल डायर और तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर सर माइकल ओड्वायर को नरसंहार के लिए दोषी मानकर तुरंत बर्खास्त किया जाए, लेकिन वायसरॉय ने जनरल डायर के एक्शन पर खेद जताया और ओड्वायर को सर्टिफिकेट ऑफ केरेक्टर दे दिया। इसमें उनकी मुक्तकंठ से सराहना की गई। तब गांधीजी ने आंदोलन चलाने का फैसला किया।

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