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नाटक का ऐसा होता है मंचन, पलक झपकाना भूल जाते हैं दर्शक

Subhash Raj

Publish: Oct 22, 2019 01:09 AM | Updated: Oct 22, 2019 01:09 AM

Alwar

अलवर. बाबा भर्तृहरि अलवर के आराध्य लोक देवता है। यहां हर अच्छे काम की शुरूआत बाबा भर्तृहरि के जयकारों के साथ होती है। यह नाटक बाबा भर्तृहरि के नीति शतक, श्रृंगार शतक व वैराग्य शतक पर आधारित है। नाटक के प्रति आस्था इतनी अधिक है कि इसके लिए दर्शक रात भर जागते हैं और पूरा नाटक देखने के बाद ही यहां से जाते हैं।

खास बात यह है कि तत्कालीन महान कलाकारों के निर्देशन में बनाए एक एक सैट मौलिक और कला के उत्तम नमूने हैं।
राजर्षि अभय समाज की ओर से 1958 में संस्था के शीर्षस्थ कलाकार पदाधिकारी मुख्यत: जयनारायण भार्गव, छोटेलाल कपूर, श्यामलाल सक्सेना, रेवडमल शर्मा, ओंकार भार्गव काली मोरी फाटक स्थित बाबा हीरानाथ की बगीची पहुंचे। वहां पहुंचकर मुरलीलाल कमल की ओर से लिखित नाटक महाराजा भर्तृहरि के कथानक को बाबा हीरानाथ व बाबा माधवनाथ जी को सुनाकर उनसे इस नाटक को खेलने की अनुमति एवं आशीर्वाद मांगा। बाबाओं ने निर्देश दिया कि प्रथम दृश्य में बाबा भोलेनाथ की आरती दिखाएं। संस्था के तत्कालीन महानिदेशक श्यामलाल सक्सेना ने वरिष्ठ सहयोगियों के साथ मिलकर नाटक के कलाकारों का चयन किया। इसी के साथ ही इस नाटक की शुरुआत हो गई।
राजर्षि अभय समाज के महामंत्री महेश चंद शर्मा ने बताया कि 1958 में श्याम सक्सेना के निर्देशन में पहली बार भर्तृहरि नाटक का मंचन किया गया। उसमें महाराजा भर्तृहरि - जयशिवलाला भास्कर, महारानी पिंगला - बिहारी लाल शर्मा, माया मछेंद्रनाथ ग्यारसीलाल बंबोला, गोरखनाथ व क्रूरसिंह - रेवडमल शर्मा, विक्रम नवल शर्मा, नगर सेठ मायादास- राधेश्याम भार्गव, बेताल -छोटेलाल कपूर, बेताली जयनारायण सैनी, मोहिनी की भूमिका अमृत खत्री ने निभाई। इस नाटक का संगीत व गीत श्यामलाल सक्सेना, छोटेलाल कपूर, लक्ष्मीनारायण भटट ने तैयार किया। नाटक का पहली बार मंचन बेहद प्रभावी था। उस समय मोहिनी की महफिल छोटी हुआ करती थी। प्रथम बार नाटक रात 9 बजे शुरू होकर 2 बजे खत्म हुआ।